उजड़ते जंगल, नंगे होते पहाड़, पर्यावरण संकट की ओर पलामू

अवैध कटाई, खनन और अतिक्रमण से बीते 10 वर्षों में तेजी से घटा वन क्षेत्र, तापमान बढ़ा, जलस्रोत सूखे, वन्यजीव गांवों की ओर पलायन को मजबूर

अवैध कटाई, खनन और अतिक्रमण से बीते 10 वर्षों में तेजी से घटा वन क्षेत्र, तापमान बढ़ा, जलस्रोत सूखे, वन्यजीव गांवों की ओर पलायन को मजबूर प्रभात खबर टीम, मेदिनीनगर कभी घने जंगलों और हरियाली से आच्छादित पहाड़ों के लिए जाना जाता था, लेकिन बीते एक दशक में हालात तेजी से बदले हैं. जहां पहले घना जंगल दिखता था, वहां आज मैदान और उजड़े पहाड़ नजर आते हैं. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन और बढ़ते अतिक्रमण ने पलामू के पर्यावरणीय संतुलन को गहरी चोट पहुंचाई है. इसके दुष्परिणाम अब साफ दिखने लगे हैं, बढ़ता तापमान, सूखते जलस्रोत और गांवों की ओर पलायन करते जंगली जानवर. जंगल–पहाड़ों का दोहन बना गंभीर पर्यावरणीय संकट पलामू में जंगल और पहाड़ों का अत्यधिक दोहन आज एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा बन चुका है. जंगलों के घटने से पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक बदलाव आए हैं, जो सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के संकेत दे रहे हैं. दिन-ब-दिन गर्मी बढ़ रही है, तो कभी अचानक तेज ठंड का एहसास हो रहा है. भूजल स्तर गिरने से नदियां और कुएं सूखने लगे हैं. बढ़ती आबादी, कृषि विस्तार और खनन माफियाओं की सक्रियता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. पलामू की पहचान बनी नीलगाय के आवास नष्ट जंगल सिमटने से नीलगायों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है. मजबूरन नीलगाय गांवों और खेतों की ओर पलायन कर रही हैं. सैकड़ों हेक्टेयर में लगी फसलें नष्ट हो रही हैं, जिससे किसान परेशान हैं. कई स्थानों पर नीलगायों की मौत के साथ-साथ मानव हताहत की घटनाएं भी सामने आयी हैं. सड़कों के निर्माण में पत्थरों का अवैध खनन पलामू प्रमंडल में सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए पहाड़ों पर दबाव बढ़ा है. पड़वा मोड़ से छतरपुर और हरिहरगंज तक के पहाड़ अवैध खनन के निशाने पर रहे हैं. सड़कों से सुविधा तो बढ़ी, लेकिन पर्यावरण को जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई आसान नहीं है. क्या कहते हैं पर्यावरण विशेषज्ञ पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव के अनुसार, 1951 के सर्वे में पलामू में 43 प्रतिशत बीहड़ जंगल थे, जो अब घटकर मात्र 10–12 प्रतिशत रह गये हैं. जंगलों और पहाड़ों के विनाश से तापमान तेजी से बढ़ रहा है. दिन और रात के तापमान में 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर देखा जा रहा है, जो क्षेत्र के धीरे-धीरे मरुस्थलीकरण की ओर बढ़ने का संकेत है. 50 प्रतिशत से अधिक इलाका बंजर हो चुका है और जलस्तर हजारों फुट नीचे चला गया है. हरिहरगंज : सिमटते जंगल, उजड़ते पहाड़ 7 डालपीएच 7 कभी घने जंगलों के लिए पहचाने जाने वाले हरिहरगंज और पीपरा प्रखंड में आज वन क्षेत्र तेजी से सिमट रहा है. साल, सखुआ, पलाश और महुआ के जंगल अब इतिहास बनते जा रहे हैं. अवैध कटाई और खनन ने कई पहाड़ों को पूरी तरह उजाड़ दिया है. छतरपुर : जंगल–पहाड़ों का अस्तित्व संकट में छतरपुर में अवैध माइनिंग और लकड़ी तस्करी के कारण कभी ऊंचे पहाड़ और घने जंगल आज गड्ढों और बंजर जमीन में तब्दील हो चुके हैं. जंगल उजड़ने से जानवर शहरों की ओर आकर अपनी जान गंवा रहे हैं, वहीं खेती भी बर्बाद हो रही है. सोहैया पहाड़ा अस्तित्व के कगार पर हुसैनाबाद अनुमंडल के पतरा पंचायत स्थित सोहैया पहाड़ा अवैध खनन और क्रशर प्लांट के कारण खंडहर बन चुका है. ब्लास्टिंग से वायु प्रदूषण बढ़ा है और आसपास के गांवों में सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हुई है. पहाड़ बचाने के लिए संघर्ष समिति पिछले दो वर्षों से आंदोलन कर रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई. जंगली जानवरों का गांवों की ओर पलायन मोहम्मदगंज, तरहसी, मनातू सहित कई इलाकों में जंगल उजड़ने से नीलगाय, जंगली सुअर और लंगूर खेतों में घुसकर फसलें बर्बाद कर रहे हैं. किसानों के सामने जंगल कटने और फसल नुकसान की दोहरी मार है. रोजाना हजारों पेड़ों की कटाई 7 डालपीएच 9 पांडू, पांकी और सतबरवा प्रखंडों में रोजाना हजारों हरे पेड़ों की कटाई हो रही है. जंगलों के भीतर ही आरा मिल लगाकर लकड़ी की चिराई की जा रही है. खुलेआम ट्रैक्टर और ऑटो से लकड़ी की ढुलाई हो रही है, जिससे वन संपदा और वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है. छापामारी के बावजूद नहीं रुक रही कटाई पाटन क्षेत्र सहित कई इलाकों में वन विभाग की छापामारी के बावजूद लकड़ी तस्करी जारी है. जंगलों को बचाने के लिए कहीं-कहीं पौधरोपण किया जा रहा है, लेकिन अवैध कटाई के आगे ये प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं.

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By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

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