महेशपुर : सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों विशेषकर आदिवासी समुदाय की युवतियों व महिलाओं के जीवन में ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले साप्ताहिक हाट का विशेष महत्व है. बड़े शहरों के बाजारों के चकाचौंध से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले साप्ताहिक हाट इनके जीवन में मेले या त्योहार से कम महत्व नहीं रखते हैं. साधारणतया हाट शब्द से बाम लोगों के बीच एक निश्चित स्थान पर रोजमर्रा की लगभग सभी तरह की चीजों के मिलने तथा खरीद बिक्री की अवधारणा बनी हुई है. परंतु शहरी व नगरीय जीवन से दूर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए
अगर ये हाट एक तरफ उनके उत्पादों के बिक्री का माध्यम बन कर उनके बाय का स्त्रोत हैं तो दूसरी तरफ आदिवासी युवतियों व महिलाओं के लिए ये हाट मेले और त्योहार जैसे तथा अपनी पुरानी संस्कृति को यथावत बनाए रखने के लिए एक सशक्त जरिया भी है. मेले और त्योहारों का एक नियत समय होता है.
वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में साप्ताहिक हाट आस-पास कहीं न कहीं एक सप्ताह में अवश्य लगते हैं. साप्ताहिक हाट में ये महिलाएं व युवतियां अपने-अपने घरों से बेचने के लिए सब्जी, सूप, डलिया, झाड़ु, हाथ के बने पंखे सहित अन्य वस्तुएं बेचने के लिए लाती है. साथ ही घर के लिए अन्य जरूरी सामानों की खरीददारी भी करती है.
इतना ही नहीं साप्ताहिक हाट में सजधज कर अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या से अलग हट कर आने के पीछे इनकी इच्छा होती है दूर बसे अपने परिजनों, रिश्तेदारों, पुराने मित्रों से मुलाकात करने की. सबों से मुलाकात कर न सिर्फ आनंद उठाती है वरन अपने आपको तरोताजा भी महसूस करती है. दूसरे शब्दों में अगर यह कहा जाय कि साप्ताहिक हाट इनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार करने का एक सशक्त माध्यम है तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
