चांडिल. सुबह की पहली रोशनी सुवर्णरेखा नदी की धार पर पड़ती है. पानी की सतह पर सूरज की किरणें चमकती हैं. इसी चमक के बीच नदी किनारे कुछ लोग कुदाल, खुरपी और लकड़ी की बनी फॉली थाली लेकर पहुंच चुके होते हैं. उनके लिए नदी का किनारा घूमने या प्रकृति का आनंद लेने की जगह नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का ठिकाना है.
कुदाल से नदी किनारे की मिट्टी और बालू खोदी जाती है. उसे थाली में भरकर पानी में धीरे-धीरे घुमाया जाता है. हल्की मिट्टी और बालू पानी के साथ बह जाती है, जबकि थाली के तल में कुछ भारी कण बचते हैं. नजरें उन्हीं कणों पर टिक जाती हैं. उम्मीद होती है कि उनमें सोने की चमक दिखाई देगी. कई बार घंटों की मेहनत के बाद सिर्फ मुट्ठी भर बारीक कण हाथ लगते हैं. इन्हीं कणों को चांडिल बाजार में बेचकर परिवार राशन और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं.
कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाली नदी, आज भी उम्मीद का सहारा
ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में सुवर्णरेखा नदी से सोने के कण तलाशने की यह तस्वीर वर्षों पुरानी है. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हैं. एक ग्रामीण बताते हैं कि उनके परिवार को करीब 60 साल से सुवर्णरेखा की रेत में सोना तलाशते हुए हो गये. उनके पिता और उससे पहले परिवार के लोग भी यही काम करते थे.
आज भी अगली पीढ़ी के सामने यही काम रोजगार का एक विकल्प बना हुआ है. सुबह घर से निकलने के बाद कोशिश रहती है कि शाम तक इतनी कमाई हो जाए कि घर का चूल्हा जल सके. लेकिन यहां मेहनत की कोई गारंटी नहीं है.
कभी 200 रुपये मिलते हैं, तो कभी 300 से 400 रुपये. सोना थोड़ा अधिक मिल गया तो 500 रुपये तक कमाई हो जाती है. वहीं कई दिन ऐसे भी गुजरते हैं, जब घंटों नदी की मिट्टी और बालू धोने के बाद उम्मीद से बहुत कम सोना हाथ लगता है.
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घंटों मेहनत, फिर भी कमाई की कोई गारंटी नहीं
सोना निकालने की प्रक्रिया देखने में भले ही आसान लगे, लेकिन इसके लिए घंटों मेहनत करनी पड़ती है. नदी किनारे बैठकर लगातार मिट्टी और बालू धोना, कुदाल चलाना और एक ही प्रक्रिया को बार-बार दोहराना शरीर को थका देता है.
गर्मी में रेत तपती है, बरसात में नदी का जलस्तर और तेज धार परेशानी बढ़ा देती है. सर्दियों में ठंडे पानी में हाथ डालकर काम करना भी आसान नहीं होता. इसके बावजूद अगले दिन ये परिवार फिर नदी किनारे पहुंच जाते हैं, क्योंकि उनके पास रोजगार का कोई स्थायी विकल्प नहीं है.
सुवर्णरेखा के अलावा बामनी नदी और आसपास के दूसरे नदी क्षेत्रों में भी कुछ परिवार सोने के कण तलाशते हैं. जहां संभावना दिखाई देती है, वहीं मिट्टी और बालू को धोने का काम शुरू हो जाता है. किस जगह सोना मिलेगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं होती. कई बार एक जगह कई दिनों तक मेहनत के बाद भी कुछ हासिल नहीं होता, तो कभी अचानक थाली में सोने के बारीक कण चमक उठते हैं. उस पल चेहरे पर आने वाली खुशी शायद उस सोने की कीमत से कहीं बड़ी होती है.
महिलाओं के हाथ भी थामते हैं थाली
इस संघर्ष में सिर्फ पुरुष ही शामिल नहीं हैं. परिवार की महिलाएं भी नदी किनारे मिट्टी और बालू धोने में बराबर हाथ बंटाती हैं. कई महिलाएं घर का काम निपटाने के बाद नदी पहुंचती हैं. कुछ अपने साथ बच्चों के लिए खाना भी लेकर आती हैं और दिन का बड़ा हिस्सा नदी किनारे ही गुजरता है.
इन परिवारों की जिंदगी में आराम के लिए ज्यादा जगह नहीं है. कमाई छोटी है, लेकिन जरूरतें बड़ी हैं. बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन, कपड़े और रोजमर्रा का खर्च इसी अनिश्चित आमदनी से पूरा करना होता है. ऐसे में नदी की रेत में मिलने वाला हर छोटा सोने का कण उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
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चांडिल बाजार तक पहुंचता है नदी का सोना
दिनभर की मेहनत के बाद निकाले गये सोने के कणों को चांडिल बाजार में बेचा जाता है. नदी से निकला सोना सीधे परिवार की जरूरतों में बदल जाता है. इसे बचाकर रखने की स्थिति नहीं होती. जितना मिलता है, उतना ही तत्काल जरूरतों को पूरा करने में लग जाता है.
यही इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है. जिस नदी के नाम में ‘सोना’ है, उसी नदी के किनारे रहने वाले लोगों की आर्थिक तंगी खत्म नहीं हुई. उनके हाथों से निकलने वाला सोना बाजार में कीमत पाता है, लेकिन उसे निकालने वाले परिवारों की जिंदगी में समृद्धि नहीं आती.
स्थायी रोजगार मिले तो कम हो सकती है मजबूरी
ग्रामीणों का कहना है कि यदि उन्हें स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध हों, तो हर दिन नदी की रेत में सोना तलाशने की मजबूरी कम हो सकती है. सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ भी जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाना जरूरी है.
फिलहाल इन परिवारों के लिए सुवर्णरेखा ही सबसे बड़ा सहारा है. सुबह की पहली किरण के साथ कुदाल उठती है और शाम की थकान के साथ थाली घर लौटती है. थाली में सोने के कुछ बारीक कण होते हैं और आंखों में अगले दिन की उम्मीद.
सुवर्णरेखा लगातार बह रही है. उसकी धार के साथ मिट्टी और बालू भी बहते रहते हैं. लेकिन नदी किनारे बैठे इन परिवारों का संघर्ष वहीं ठहरा हुआ है. वे हर दिन सिर्फ सोना नहीं तलाशते, वे दरअसल अपनी जिंदगी तलाशते हैं—एक ऐसे छोटे से कण में, जो शाम तक उनके घर का चूल्हा जला सके.
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