बेतला से संतोष कुमार की रिपोर्ट
World Environment Day 2026, लातेहार: झारखंड की प्राकृतिक धरोहर और देश के सबसे पुराने बाघ अभ्यारण्यों में से एक, पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. करीब 1129 वर्ग किलोमीटर में फैला यह विशाल जंगल धीरे-धीरे सिमट रहा है. हालिया सैटेलाइट तस्वीरों और जमीनी रिपोर्टों से साफ है कि रिजर्व के भीतर वनों का घनत्व तेजी से घट रहा है. पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाये गये, तो आने वाले दिनों में इस रिजर्व का अस्तित्व केवल कागजों तक ही सीमित रह जायेगा. जंगलों के इस विनाश के पीछे मैन पावर के अभाव में प्रशासनिक ढिलाई, स्थानीय लोगों में जागरूकता की कमी और अपराधियों का गठजोड़ मुख्य वजह बनकर उभरा है.
संगठित तस्कर गिरोह और कीमती लकड़ियों की लूट
पलामू टाइगर रिजर्व के जंगलों के घटने की सबसे बड़ी वजह यहां सक्रिय संगठित लकड़ी तस्करों का गिरोह है. रिजर्व के कोर और बफर जोन में सालों पुराने कीमती पेड़ों को रात के अंधेरे में काटा जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय अपराधियों और अंतरराज्यीय तस्करों का एक मजबूत नेटवर्क यहां काम कर रहा है. यह गिरोह अत्याधुनिक कटर मशीनों का इस्तेमाल कर चंद घंटों में ही पूरा जंगल साफ कर देता है. इतना ही नहीं पेंगोलिन के शल्क, सांपों के जहर और हिरण सहित अन्य जंगली जानवरों के शिकार के मामले भी बढ़े हैं, जिससे स्पष्ट है कि इन अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैं. दुर्गम पहाड़ी रास्तों और सुरक्षाकर्मियों की भारी कमी का फायदा उठाकर ये तस्कर वन संपदा को खुलेआम लूट रहे हैं.
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बढ़ता मानवीय दबाव और वनों पर निर्भरता
तस्करी के अलावा, पीटीआर के भीतर और उसकी सीमाओं पर बसे सैकड़ों गांवों का मानवीय दबाव इस जंगल को खोखला कर रहा है. बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि का विस्तार करने के लिए जंगलों को साफ किया जा रहा है. स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मवेशियों की अनियंत्रित चराई से नये पौधे पनप नहीं पा रहे हैं. इसके साथ ही, रोजाना टनों सूखी और गीली लकड़ियां ईंधन के रूप में जंगलों से काटी जा रही हैं. महुआ और अन्य वनोपज चुनने के चक्कर में हर साल गर्मियों में जंगल में जानबूझकर आग लगा दी जाती है. यह आग नये पौधों, छोटे जीवों और जड़ी-बूटियों को पूरी तरह नष्ट कर देती है, जिससे जंगल की प्राकृतिक रूप से दोबारा पनपने की क्षमता खत्म हो रही है.
जागरूकता का घोर अभाव और संरक्षण की बड़ी चुनौतियां
इस पूरी त्रासदी का सबसे दुखद पहलू स्थानीय स्तर पर पर्यावरण जागरूकता का घोर अभाव है. रिजर्व के आसपास रहने वाले समुदायों को यह अहसास ही नहीं है कि जंगलों का नष्ट होना उनके खुद के भविष्य के लिए कितना बड़ा खतरा है. वन विभाग और आम जनता के बीच समन्वय की भारी कमी है, जिसके कारण ग्रामीण तस्करों की सूचना अधिकारियों तक नहीं पहुंचाते. जंगलों के इस कटाव का सीधा असर अब वन्यजीवों पर दिखने लगा है. बाघों, हाथियों और तेंदुओं का प्राकृतिक आवास नष्ट होने से ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ चरम पर पहुंच गया है. भोजन-पानी की तलाश में जंगली जानवर आये दिन गांवों में घुस रहे हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है.
क्या कहते हैं पर्यावरण विशेषज्ञ
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ डीएस श्रीवास्तव ने कहा कि पलामू टाइगर रिजर्व को बचाने के लिए अब केवल कागजी बैठकों से काम नहीं चलेगा. इसके लिए वन विभाग को आधुनिक संसाधनों और ड्रोन तकनीक से लैस करना होगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इको-डेवलपमेंट समितियों को पुनर्जीवित कर स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार के वैकल्पिक साधन देने होंगे, ताकि जंगलों पर उनकी निर्भरता कम हो सके. जब तक स्थानीय लोग इस जंगल को अपना नहीं मानेंगे, तब तक तस्करों के इस नेटवर्क को तोड़ना नामुमकिन है.
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