मां की मौत के बाद अनाथ हुई 6 माह की नन्हीं हथिनी राखी, अब बनी बेतला की धड़कन

बेतला नेशनल पार्क की हथिनी राखी की कहानी, जिसने अनाथ होने के बाद इंसानी ममता और संरक्षण के बीच एक नया जीवन पाया। पढ़ें यह भावुक और प्रेरणादायक रिपोर्ट।

2014 में वज्रपात से हुई थी मां की मौत. दो दिनों तक शव के पास बैठकर मां को जगाती रही मासूम हथिनी. रक्षाबंधन के दिन बेतला पहुंचने पर मिला नाम राखी

बेतला नेशनल पार्क . कुदरत के नियम जितने विहंगम हैं, कभी-कभी उतने ही निष्ठुर और कलेजा चीर देने वाले भी हो जाते हैं. जंगल का भी अपना एक मौन विलाप होता है, जिसे अक्सर इंसान सुन नहीं पाता. लेकिन पलामू टाइगर रिजर्व के बफर एरिया स्थित गारू पश्चिमी रेंज के घने जंगलों में ममता से उजड़ने और अनाथ बचपन की यह कहानी इंसानी संवेदना की ऐसी मिसाल बन गई, जिसे वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में लंबे समय तक याद किया जाएगा.

यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि एक नन्हीं जान की जिंदगी बचाने के लिए वन विभाग, डॉक्टरों, महावतों और प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनशीलता की भी है. काल के क्रूर प्रहार से बचाई गई वह नन्हीं हथिनी आज बेतला नेशनल पार्क की पहचान बन चुकी है. उसका नाम है राखी.

6 माह की उम्र में मां पर गिरा वज्रपात

कहानी वर्ष 2014 के सावन महीने से शुरू होती है. उस समय राखी महज छह महीने की थी. उसे जंगल के रास्तों की पहचान तक नहीं थी और न ही वह खुद से भोजन तलाशना जानती थी. वह अपनी मां के साथ गारू रेंज के घने जंगलों में घूमती और चरती थी. मां की सूंड़ का स्पर्श ही उसकी पूरी दुनिया था. लेकिन एक दिन अचानक आसमान में काले बादल छा गए. देखते ही देखते आकाशीय बिजली उसकी मां हथिनी पर जा गिरी. तेज गड़गड़ाहट के बीच मां ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. छह महीने की मासूम हथिनी देखते ही देखते अनाथ हो गई.

दो दिनों तक मां के शव के पास बैठी रही

मां की मौत का अर्थ उस मासूम को क्या पता था. वह दो दिनों तक अपनी मृत मां के शव के पास बैठी रही. अपनी छोटी सी सूंड़ से वह बार-बार मां के शरीर को सहलाती, उसे हिलाती और उठाने की कोशिश करती रही. शायद उसे लगता था कि उसकी मां सो रही है और थोड़ी देर बाद उठ जाएगी.

भटकते हुए हेसवा गांव पहुंच गई

दो दिनों तक उसने न ठीक से कुछ खाया और न पानी पिया. गर्मी के कारण जब शव से दुर्गंध आने लगी, तो भूख, प्यास और अकेलेपन से परेशान राखी जंगल से बाहर निकल आई. भटकते-भटकते वह गारू के हेसवा गांव पहुंच गई. ग्रामीणों ने जब इस नन्हीं और असहाय हथिनी को अकेले भटकते देखा, तो उनका दिल पसीज गया. उन्होंने उसे सुरक्षित पकड़ा और वन विभाग को सूचना दी. इसके बाद वनकर्मियों ने उसे अपने संरक्षण में ले लिया.

रक्षाबंधन के दिन बेतला पहुंची

सूचना मिलते ही पलामू टाइगर रिजर्व की रेस्क्यू टीम सक्रिय हो गई. बेहद कमजोर और घायल हालत में राखी को सुरक्षित रेस्क्यू कर बेतला नेशनल पार्क लाया गया. संयोग से जिस दिन वह बेतला पहुंची, उस दिन रक्षाबंधन था. अनाथ बच्ची को जीवन और सुरक्षा देने के इस भावुक संयोग को देखते हुए वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उसका नाम राखी रख दिया.

जब संकटमोचक बने तत्कालीन मुख्य सचिव

रेस्क्यू के समय राखी की हालत बेहद गंभीर थी. मां को खोने का सदमा, दो दिनों की भूख-प्यास और शरीर पर लगी चोटों ने उसे बुरी तरह कमजोर कर दिया था. बेतला के डॉक्टरों को आशंका थी कि वह शायद ज्यादा देर तक जीवित नहीं रह पाएगी. इसी दौरान तत्कालीन मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, संयोग से बेतला के दौरे पर पहुंचे थे. राखी की हालत देखकर वह बेहद भावुक हो गए. उन्होंने वीआईपी प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना उसकी जान बचाने का फैसला किया.

पूरी रात राखी के पास बैठे रहे सजल चक्रवर्ती

सजल चक्रवर्ती ने पूरी रात राखी के पास रहकर उसकी हालत पर नजर रखी. उन्होंने खुद उसकी सांसों की निगरानी की. सुबह होते ही उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप पर रांची से विशेषज्ञ डॉक्टरों की विशेष टीम को बेतला बुलाया गया.

ये भी पढ़ें: JSSC CGL Paper Leak: CID ने की 20 संदिग्धों से पूछताछ, अब तक 8 अभ्यर्थी गिरफ्तार

विशेषज्ञ डॉक्टरों ने किया राखी का इलाज

विशेषज्ञ डॉक्टरों ने पहुंचकर राखी का इलाज शुरू किया. सघन चिकित्सा और लगातार देखरेख के बाद उसकी हालत में सुधार होने लगा. डॉक्टरों की मेहनत और सजल चक्रवर्ती की संवेदनशीलता ने मिलकर उस नन्हीं हथिनी को नया जीवन दे दिया.

महावतों ने निभाई परिवार की भूमिका

इलाज के बाद राखी की शारीरिक चोटें तो ठीक हो गईं, लेकिन छह महीने की उम्र में मां को खो देने के कारण वह इंसानों पर पूरी तरह निर्भर हो चुकी थी. जंगल में खुद से जीवित रहना उसके लिए संभव नहीं था. ऐसे समय में बेतला के महावत उसके सहारे बने. उन्होंने दिन-रात उसकी देखभाल की. रोटी, केला और दूध अपने हाथों से खिलाकर उन्होंने उसे बच्चे की तरह पाला. महावतों ने उसके लिए मां और पिता दोनों की भूमिका निभाई.

धीरे-धीरे राखी ने इंसानों को अपना परिवार मान लिया. महावतों के प्यार और देखभाल ने उसके भीतर मां को खोने का दर्द काफी हद तक कम कर दिया.

आज बेतला की शान है राखी

समय बीतता गया. डॉक्टरों की देखरेख और महावतों की निस्वार्थ सेवा रंग लाई. काल के गाल से खींचकर लाई गई वह नन्हीं हथिनी आज पूरी तरह स्वस्थ और विशालकाय हो चुकी है. राखी अब सिर्फ एक हथिनी नहीं है. वह पलामू टाइगर रिजर्व की जीवटता और इंसानी संवेदना का जीवंत प्रतीक बन चुकी है. बेतला नेशनल पार्क आने वाले पर्यटकों के लिए भी वह खास आकर्षण का केंद्र है.

ये भी पढ़ें: Latehar News: बेतला में 1500 से घटकर सिर्फ 68 बाइसन बचे, इनब्रीडिंग और घटते चरागाह से अस्तित्व पर संकट

12 साल बाद भी मकसूद की आवाज पहचानती है राखी

राखी अपने जीवन को बचाने वाले महावत मकसूद को आज भी नहीं भूली है. 12 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और राखी अब विशाल हथिनी बन चुकी है. इसके बावजूद मकसूद की आवाज सुनते ही वह दौड़ पड़ती है.

फिलहाल मकसूद राखी की देखरेख नहीं कर रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच बना लगाव आज भी कायम है. यह रिश्ता बताता है कि जानवर इंसानी प्रेम और अपनापन कभी नहीं भूलते.

राखी की कहानी इस बात की जीवंत मिसाल है कि संवेदना, जिम्मेदारी और प्रेम के साथ इंसान आगे आए, तो प्रकृति के सबसे क्रूर संकट के बीच भी जिंदगी को नया मौका दिया जा सकता है.

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Santosh prasad betla

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >