बरवाडीह (लातेहार). जिले के बरवाडीह प्रखंड अंतर्गत सरईडीह अपग्रेडेड प्लस टू हाई स्कूल में इन दिनों एक सकारात्मक बदलाव की बयार बह रही है. शिक्षा के क्षेत्र में कभी बेहद पिछड़े माने जाने वाले इस इलाके में प्रभारी प्रधानाध्यापक उमेश टोप्पो के दूरदर्शी प्रयासों ने पूरे माहौल को बदल कर रख दिया है. उन्होंने न केवल बुनियादी शैक्षणिक ढांचे को सुदृढ़ किया है, बल्कि बच्चों के भविष्य को एक नई दिशा भी दी है.
पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा की नई अलख
सरईडीह और इसके आसपास का इलाका भौगोलिक और सामाजिक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. शिक्षा के प्रति उदासीनता और संसाधनों की कमी के कारण यहाँ की शैक्षणिक व्यवस्था बदहाल थी. ऐसे माहौल में प्रभारी प्रधानाध्यापक उमेश टोप्पो ने कमान संभाली और अपने थकाऊ प्रयासों से व्यवस्था को सुदृढ़ करने में उल्लेखनीय योगदान दिया. उनके इसी समर्पण का नतीजा है कि यह स्कूल आज न केवल एक आदर्श विद्यालय बनने की राह पर है, बल्कि राज्य सरकार के ''सीएम उत्कृष्ट विद्यालय'' (स्कूल ऑफ एक्सीलेंस) का दर्जा हासिल करने की दिशा में भी मजबूती से कदम बढ़ा रहा है.
छात्राओं को शिक्षा से जोड़ने पर विशेष जोर
इस बदलाव का सबसे खूबसूरत पहलू सामाजिक समावेशन रहा है. उमेश टोप्पो ने बेतला पोखरी जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों का दौरा कर बच्चों, विशेषकर छात्राओं को शिक्षा के महत्व से रूबरू कराया. उन्होंने रूढ़ियों को तोड़ते हुए बालिकाओं को नियमित रूप से विद्यालय आने के लिए प्रेरित किया. आज इस इलाके की बेटियां बिना किसी बाधा के हर रोज स्कूल आ रही हैं. इसके साथ ही केचकी, कंचनपुर और कोलपुरवा जैसे अत्यंत पिछड़े और हाशिए पर मौजूद गांवों के बच्चों को भी मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़कर आगे बढ़ने का काम किया गया है.
कंप्यूटर और साइंस लैब से जुड़ रहे बच्चे
ग्रामीण परिवेश के बच्चों को वैश्विक स्तर की शिक्षा देने के लिए प्रभारी प्रधानाध्यापक ने बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया. उनके कड़े संघर्ष और अथक प्रयासों के बाद आज विद्यालय में अत्याधुनिक कंप्यूटर लैब और उन्नत साइंस लैब पूरी तरह क्रियाशील हैं. अब यहाँ के ग्रामीण बच्चे भी कंप्यूटर की कुंजियों पर उंगलियां फिरा रहे हैं और विज्ञान के व्यावहारिक प्रयोगों को आसानी से समझ रहे हैं. यह डिजिटल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण इन बच्चों के आत्मविश्वास को एक नए स्तर पर ले जा रहा है.
पढ़ाई के साथ खेलकूद पर भी ध्यान
उमेश टोप्पो का मानना है कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है. इसलिए उन्होंने केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर खेलकूद की गतिविधियों को भी विद्यालय के मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया. बच्चे मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों से मजबूत और निपुण बनें, इसके लिए खेल के मैदान को पुनर्जीवित किया गया. विभिन्न प्रकार के खेलों के माध्यम से बच्चों में टीम भावना, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता का विकास किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण प्रतिभाएं उभर कर सामने आ रही हैं.
अभिभावकों से घर-घर जाकर किया संपर्क
किसी भी विद्यालय की सफलता में समुदाय की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण होती है. प्रभारी प्रधानाध्यापक ने इस सूत्र को बखूबी समझा. उन्होंने न केवल समय-समय पर शिक्षक-अभिभावक बैठकें (PTM) आयोजित कीं, बल्कि पर्सनली (व्यक्तिगत रूप से) भी ग्रामीण अभिभावकों के घरों तक पहुंच बनाई. उन्होंने अभिभावकों से सीधा संवाद स्थापित कर बच्चों को बिना नागा रोजाना विद्यालय भेजने की भावुक व तार्किक अपील की. इस आत्मीय प्रयास का असर यह हुआ कि स्कूल में ड्रॉप-आउट दर में भारी कमी आई है.
ग्रामीण इलाके में शहरी स्कूल जैसी सुविधाएं
स्कूल में हो रहे बदलाव के बाद अब यहां अनुशासन, पढ़ाई का माहौल और आधुनिक सुविधाएं पहले की तुलना में बेहतर हुई हैं. सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित यह विद्यालय सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है. विद्यालय की स्थिति यह संदेश देती है कि बेहतर नेतृत्व और लगातार प्रयास से ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में भी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है.
माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने भी की सराहना
इस विद्यालय की बदलती सूरत पर राज्य के माध्यमिक शिक्षा निदेशक राजेश प्रसाद ने भी अपनी विशेष प्रसन्नता व्यक्त करते हुए प्रभारी प्रधानाध्यापक के प्रयासों की सराहना की है. दरअसल, माध्यमिक शिक्षा निदेशक स्वयं इसी क्षेत्र के मूल निवासी हैं और उन्होंने इस सुदूर ग्रामीण इलाके की पूर्व की बदहाल व दयनीय स्थिति को बेहद करीब से देखा है. अपनी माटी के एक स्कूल को इस तरह आधुनिकता और उत्कृष्टता की ओर बढ़ते देख उन्होंने उमेश टोप्पो की पीठ थपथपाई है. निदेशक ने कहा कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों में ऐसे समर्पित शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था की असली ताकत हैं और उनका यह प्रयास पूरे राज्य के लिए एक प्रेरणास्रोत है.
