झारखंड में अस्तित्व के संकट से जूझ रहे बाइसन, बेतला बचा आखिरी बड़ा ठिकाना में भी तेजी से घट रही आबादी

झारखंड के बेतला नेशनल पार्क में बाइसन की संख्या तेजी से घट रही है। पर्यावरणविदों ने मवेशियों की चराई और बीमारियों को बाइसन के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बताया है।

बेतला. कभी सारंडा, डालमा, हजारीबाग और गुमला के घने जंगलों में बड़ी संख्या में स्वच्छंद विचरण करने वाले बाइसन यानी गौर अब झारखंड में अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. पर्यावरणविद् और राज्य वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य डॉ. डीएस श्रीवास्तव ने बेतला नेशनल पार्क यानी पलामू टाइगर रिजर्व में बाइसन की घटती आबादी पर गहरी चिंता जतायी है. उन्होंने कहा कि बेतला अब झारखंड में बाइसन की आखिरी प्रमुख आबादी का ठिकाना बचा है, लेकिन यहां भी उनकी संख्या तेजी से घट रही है.

मानवीय हस्तक्षेप और घरेलू मवेशियों का बढ़ता दबाव

डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, बाइसन के सामने सबसे बड़ा संकट मानवीय हस्तक्षेप और घरेलू मवेशियों का बढ़ता दबाव है. उनका दावा है कि पलामू टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों से आने वाले 1.5 लाख से अधिक घरेलू मवेशियों की चराई से बाइसन के प्राकृतिक आवास और घास के मैदान प्रभावित हो रहे हैं. इससे भोजन की उपलब्धता घट रही है और बाइसन कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. इसका असर उनकी शारीरिक क्षमता और प्रजनन दर पर भी पड़ रहा है.

मवेशियों से बीमारी फैलने का भी खतरा

उन्होंने कहा कि घरेलू मवेशियों की मौजूदगी से केवल भोजन का संकट नहीं है, बल्कि संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है. पालतू मवेशियों से खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियां जंगली जीवों तक पहुंच सकती हैं. इससे बाइसन की आबादी पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है.

सीमित आबादी से बढ़ रहा अंतःप्रजनन का खतरा

डॉ. श्रीवास्तव ने बाइसन के सीमित आवास को भी गंभीर चुनौती बताया. उनके अनुसार, बेतला के सीमित क्षेत्र में आबादी सिमटने से अलग-अलग झुंडों के बीच संपर्क कम हुआ है. इससे अंतःप्रजनन बढ़ने और आनुवंशिक विविधता प्रभावित होने का खतरा है. इसका असर आने वाली पीढ़ियों की शारीरिक क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ सकता है.

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सिर्फ बाहर से बाइसन लाना समाधान नहीं

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि वन विभाग द्वारा मध्य प्रदेश से नए बाइसन लाकर आनुवंशिक विविधता बढ़ाने का प्रयास सराहनीय है, लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता. इसके लिए बेतला के कोर एरिया को घरेलू मवेशियों की चराई से मुक्त करना जरूरी है.

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प्राकृतिक आवास, पर्याप्त भोजन और स्वच्छ पानी

उन्होंने पीटीआर से जुड़े गांवों के मवेशियों का शत-प्रतिशत टीकाकरण कराने की जरूरत पर भी जोर दिया. उनके अनुसार, बाइसन को उनका प्राकृतिक आवास, पर्याप्त भोजन और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना होगा. स्थानीय बाइसन की मौजूदा आबादी की सुरक्षा, नियमित मॉनिटरिंग और प्राकृतिक गलियारों का संरक्षण पीटीआर प्रबंधन की प्राथमिकता होनी चाहिए. नए और स्थानीय बाइसन का मेल तभी प्रभावी होगा, जब जमीनी स्तर पर घरेलू मवेशियों के दबाव और आवास संकट को दूर करने के ठोस कदम उठाये जाएं.

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By Deepak

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