दम तोड़ रही है लातेहार की अर्थव्यवस्था, लाह-महुआ की फसल बर्बाद, कारखाने बंद

आशीष टैगोर, लातेहार लातेहार जिले की शहरी व ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सी गयी है. इसका असर दोनों क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है. ग्रामीण क्षेत्र में लाह व महुआ की लगातार कम होती पैदावार किसानों की कमर तोड़ रही है. वहीं शहरी क्षेत्र में लोगों के पास आय का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो […]

आशीष टैगोर, लातेहार

लातेहार जिले की शहरी व ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सी गयी है. इसका असर दोनों क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है. ग्रामीण क्षेत्र में लाह व महुआ की लगातार कम होती पैदावार किसानों की कमर तोड़ रही है. वहीं शहरी क्षेत्र में लोगों के पास आय का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. इसका सीधा असर लातेहार के बाजार पर दिख रहा है. बाजार की रौनक फीकी पड़ गयी है. यहां तक कि लोग होली व दीपावली जैसे पर्व त्यौहारों में भी सिर्फ रस्मों की अदायगी ही कर पा रहे हैं.

व्यवसाय मुख्य आधार

शहर के लोगों के आय का मुख्य स्त्रोत व्यवसाय है. सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी भी स्थानीय लोग नहीं है. 90 के दशक तक शहर में दर्जनों आढ़त थे. इन आढ़तों में लाह, महुआ, तेलहन व दलहन की खरीददारी होती थी. मार्च से जून-जुलाई तक लाह की फसल की खरीदारी होती थी. एक जमाना था जब लातेहार को लाह के लिए विश्व भर में अग्रणी माना जाता था. लेकिन आज यहां लाह की पैदावार 10 प्रतिशत भी नहीं रह गयी है. यही हाल महुआ का है.

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई एवं प्रतिकूल मौसम के कारण लाह व महुआ की फसल मारी जा रही है. लिहाजा व्यवसायियों का व्यवसाय ठप पड़ गया है. आढ़त में ताले लटक गये हैं. बाजार की रौनक यहीं से कम पड़ने लगी. लाह व्यवसायी विजय शर्मा कहते हैं कि सरकारी एवं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण जिले से लाह की पैदावार घटती जा रही है. किसानों को समय पर लाह के बीज उपलब्ध करा कर एवं उनका मार्गदर्शन कर लाह की पैदावार को फिर से बढ़ाया जा सकता है.

नहीं लगे खनिज आधारित उद्योग धंधे

प्रकृति ने लातेहार जिला को अपार खनिज संपदा दी है. जिले में कोयला एवं बाक्साईट का अकूत भंडार है. एक अनुमान के अनुसार अगर सौ वर्ष भी यहां खुदाई की जाए तो भी यहां का कोयला खत्म नहीं होगा. लेकिन आज तक लातेहार में खनिज पर आधारित कल कारखाने नहीं लगे. वर्ष 2005 में तत्कालीन अर्जुन मुंडा की सरकार ने हिंडाल्को के साथ लातेहार में अल्युमिनियम कारखाना एवं कैप्टिव पावर प्लांट लगाने के लिए एमओयू किया तो लोगों को लगा शायद लातेहार के दिन बहुरेगें. लेकिन ऐन मौके पर हिंडाल्को ने यह कहकर कि लातेहार में पर्याप्त पानी नहीं है, कारखाना को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया.

इसके बाद से लोगों के दिलों में निराशा घर गयी. लोग आज भी यहां खनिज संपदा आधारित कल कारखानों की बाट जोह रहे हैं. चंदवा में अभिजीत ग्रुप के द्वारा पावर प्लांट लगाने का काम तो शुरू किया गया लेकिन काम पूरा होने से पहले ही कारखाना बंद हो गया. हालांकि जिले के लातेहार में डीवीसी के द्वारा तुबेद कोल माइंस एवं एनटीपीसी के द्वारा चंदवा प्रखंड के बनहरदी ग्राम में कोयला उत्खनन को ले कर कार्य प्रगति पर है. दोनो कोलियरी खुल जाने से क्षेत्र में रोजगार के अवसर अवश्य बढ़ेंगे.

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