स्वरोजगार अपना कर समृद्ध बनें

जयनगर : डीवीसी भूमि संरक्षण विभाग जलीय संसाधन मैथन व एसआइपी बांझेडीह की ओर से एडमिन भवन में आयोजित तीन दिवसीय मछली पालन प्रशिक्षण शुक्रवार को संपन्न हुआ. डीवीसी के मुख्य अभियंता एके बनर्जी ने प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को प्रमाण पत्र व उपहार देते हुए कहा कि ग्रामीण इस प्रशिक्षण का लाभ उठायें. सरकार सबको […]

जयनगर : डीवीसी भूमि संरक्षण विभाग जलीय संसाधन मैथन व एसआइपी बांझेडीह की ओर से एडमिन भवन में आयोजित तीन दिवसीय मछली पालन प्रशिक्षण शुक्रवार को संपन्न हुआ. डीवीसी के मुख्य अभियंता एके बनर्जी ने प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को प्रमाण पत्र व उपहार देते हुए कहा कि ग्रामीण इस प्रशिक्षण का लाभ उठायें. सरकार सबको नौकरी नहीं दे सकती है, मगर स्वरोजगार से खुद को समृद्ध बनाया जा सकता है.
प्रशिक्षक के रूप में उपस्थित हजारीबाग के मत्स्य पदाधिकारी शंभु प्रसाद यादव व पूर्व मत्स्य पदाधिकारी मंगल प्रसाद ने मछली पालन को लेकर सरकार की योजनाओं, तालाबों की तैयारी व प्रबंधन की जानकारी दी. प्रशिक्षण के तीसरे सत्र की अध्यक्षता जलीय प्रबंधन मैथन के कार्यपालक अभियंता डाॅ एनसी साहा ने की व संचालन एसआइपी की परियोजना पदाधिकारी कांता सोरेन ने किया.
मौके पर डीवीसी के पीके सहाय, एसके धारा, तिलैया डैम एसआइपी के सीनियर मैनेजर हरिश चंद्र सिंह, विशेष सहायक बोधी पंडित, उपेंद्र कुमार, प्रशिणार्थियों में दामोदर यादव, रामदेव यादव, अनवर अंसारी, सुभाष यादव, दिनेश यादव, रेखा देवी, मुकेश कुमार, रूपलाल यादव, मोइन अंसारी, अजय शर्मा, सुरेंद्र यादव, राजेंद्र यादव, सावित्री देवी, सरिता देवी, सफीक, सदीक, एकरामुल, साहिद, सोहेल आदि मौजूद थे.
कैसे करें तालाबों की तैयारी : प्रशिक्षक शंभु प्रसाद यादव ने प्रशिक्षण में आये लोगो को बताया कि मछली पालन के लिए मुख्य तालाब की तैयारी व प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि तालाबों में जल का एक आयतन तथा न्यूनतम गहराई का होना जरूरी है.
संर्वधन काल में औसतन 1-3 मीटर गहराई होनी चाहिए. तालाब में सभी प्रकार की मछलियों का उन्मूलन करने के लिए महुआ की खल्ली 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टर मीटर की दर से अथवा 25-30 मिलीग्राम ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करें. जलीय परितंत्र को शुद्ध करने के लिए चूना का प्रयोग करें. इससे रोग के प्रसार में भी कमी आती है.
उन्होंने बताया कि तालाब की प्रारंभिक स्तर की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कार्बनिक तथा रासायनिक खाद का प्रयोग करें. उन्होंने बताया आम तौर पर जहां उर्वरकों की मात्र का निर्धारण, मिट्टी की गुणवत्ता की जांच के आधार पर ना हो सके वैसी परिस्थिति में दो हजार किलोग्राम गोबर प्रति हेक्टर में देना चाहिए.

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