विवादों में क्यों रहती हैं JPSC की भर्ती परीक्षाएं? जानिए 2003 से 2026 तक कब क्या लगे आरोप

झारखंड में JPSC की भर्ती परीक्षाएं पिछले दो दशकों से बार-बार विवादों में रही हैं. कभी चयन प्रक्रिया, कभी मूल्यांकन, कभी आरक्षण, तो कभी OMR और नियमों में बदलाव को लेकर सवाल उठे. 2003 से 2026 तक के प्रमुख विवादों और उनके पीछे बार-बार सामने आने वाले कारणों को इस एक्सप्लेनर में समझिए.

हर कुछ सालों में परीक्षा होती है, रिजल्ट आता है और फिर शुरू होता है विवाद, विरोध प्रदर्शन, अदालत की सुनवाई और जांच का सिलसिला. 2003 से 2026 तक का इतिहास देखें तो तस्वीर यही बताती है कि विवाद कोई अपवाद नहीं, बल्कि झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक बार-बार सामने आने वाला पैटर्न बन चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर JPSC की भर्ती परीक्षाएं बार-बार विवादों में क्यों घिरती हैं.

इस लेख में जानेंगे कि JPSC की संयुक्त सिविल सेवा परीक्षाओं में क्या-क्या विवाद हुए, किन मामलों में अदालत और जांच एजेंसियों को दखल देना पड़ा, और वे कौन-से कारण हैं जिनकी वजह से आयोग की भर्ती प्रक्रिया लगातार सवालों के घेरे में रही है.

JPSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर क्या विवाद हैं

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा पिछले दो दशकों में 14 संयुक्त सिविल सेवा परीक्षाएं आयोजित की गई है, और लगभग हर प्रमुख संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा किसी न किसी विवाद में घिरी रही है. कभी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे, कभी मूल्यांकन प्रणाली पर, कभी आरक्षण, तो कभी नियमों में बदलाव और पारदर्शिता को लेकर अभ्यर्थियों ने आंदोलन किया.

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पहली JPSC (2003): शुरुआत ही विवाद से

झारखंड राज्य गठन के बाद 64 पदों के लिए पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा आयोजित हुई. लेकिन प्रारंभिक परीक्षा में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद इसे दोबारा कराना पड़ा. मुख्य परीक्षा के परिणाम आने के बाद भी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे. बाद की जांच में उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और चयन में कथित गड़बड़ियों के आरोप सामने आए. मामला पहले निगरानी ब्यूरो और फिर हाईकोर्ट के आदेश पर CBI तक पहुंचा.

दूसरी JPSC (2005-06): रिश्तेदार कांड

172 पदों की इस परीक्षा ने JPSC के इतिहास का पहला बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा किया. आरोप लगे कि प्रभावशाली नेताओं, वरिष्ठ IAS-IPS अधिकारियों और आयोग से जुड़े लोगों के करीबी रिश्तेदार मेरिट सूची में शीर्ष स्थानों पर पहुंचे. हाईकोर्ट के निर्देश पर CBI जांच हुई, जिसमें उत्तर पुस्तिकाओं में कथित छेड़छाड़, अंकों में हेरफेर और इंटरव्यू में मनमानी अंक देने जैसे आरोप सामने आए. आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष, परीक्षा नियंत्रक समेत कई लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई.

तीसरी JPSC (2008): इंटरव्यू में दिए गए अंकों पर सवाल

242 पदों के लिए हुई इस परीक्षा में मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू के अंकों को लेकर विवाद हुआ. अभ्यर्थियों का आरोप था कि लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले कई उम्मीदवार अंतिम चयन से बाहर हो गए, जबकि कुछ अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में असामान्य रूप से अधिक अंक मिले. मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे.

चौथी JPSC (2012-13): कटऑफ और सप्लीमेंट्री रिजल्ट को लेकर हुआ विवाद

219 पदों की इस परीक्षा में आयोग ने अलग-अलग चरणों में अतिरिक्त परिणाम (Supplementary Result) जारी किए. इससे कटऑफ में बदलाव और चयन प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति बनी. कई अभ्यर्थियों ने इसे नियमों के विपरीत बताते हुए विरोध किया और मामला अदालत तक पहुंचा.

पांचवीं JPSC (2015): आरक्षण नियमों को लेकर भी हुआ विवाद

269 पदों की इस परीक्षा में आरक्षण नीति के पालन को लेकर विवाद हुआ. अभ्यर्थियों का आरोप था कि मेरिट लिस्ट और आरक्षण के लिए संवैधानिक प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया, जिससे विभिन्न वर्गों के कटऑफ और चयन सूची पर असर पड़ा. इस मुद्दे पर भी न्यायालय में याचिकाएं दाखिल हुईं.

छठी JPSC (2016): परीक्षा के बीच में बदल दिए गए नियम

326 पदों के लिए आयोजित यह परीक्षा करीब पांच साल तक कानूनी विवादों में फंसी रही. सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब आयोग ने मुख्य परीक्षा के बाद क्वालीफाइंग पेपर (हिंदी और अंग्रेजी) के अंक भी अंतिम मेरिट में जोड़ दिए. अभ्यर्थियों ने इसे नियमों के खिलाफ बताया. बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने आयोग की मेरिट सूची रद्द कर नियमों के अनुसार नई मेरिट तैयार करने का निर्देश दिया.

7वीं से 10वीं JPSC (2021): रोल नंबर और OMR शीट को लेकर शिकायत

बैकलॉग खत्म करने के लिए आयोग ने चार संयुक्त सिविल सेवा परीक्षाएं एक साथ आयोजित कीं. परिणाम आने के बाद लगातार रोल नंबर वाले बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के चयन को लेकर सवाल उठे. इसके अलावा OMR शीट से जुड़ी शिकायतों ने भी विवाद को बढ़ाया. छात्रों के विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए.

11वीं से 13वीं JPSC: आंसर-की को लेकर अभ्यर्थियों ने उठाए सवाल

तीन संयुक्त परीक्षाओं के दौरान प्रारंभिक परीक्षा के कई प्रश्नों और मॉडल आंसर-की को लेकर अभ्यर्थियों ने आपत्ति जताई. विरोध के बाद आयोग को संशोधित आंसर-की जारी करनी पड़ी. हालांकि अंतिम परिणाम जारी होने और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी कुछ अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी.

14वीं JPSC (2026): परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल

103 पदों के लिए आयोजित 14वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम आने के बाद कटऑफ, OMR और परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठे. इसके बाद CID और SIT ने जांच शुरू की. जांच के दौरान आयोग के अधिकारियों, परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े निजी एजेंसी के प्रतिनिधियों और अन्य लोगों पर कार्रवाई हुई. विवाद बढ़ने के बीच मुख्य परीक्षा स्थगित कर दी गई, आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने इस्तीफा दे दिया और राज्यभर में अभ्यर्थियों का आंदोलन शुरू हो गया. मामले की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है.

अब समझिए JPSC में बार-बार विवाद क्यों होते हैं?

2003 से लेकर 2026 तक झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की लगभग हर बड़ी परीक्षा किसी न किसी विवाद में घिरी है और पिछले दो दशकों के विवादों को देखें तो इसके पीछे कुछ सामान्य कारण बार-बार सामने आते हैं.

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परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता

JPSC परीक्षा संचालन और डेटा प्रोसेसिंग जैसे कई तकनीकी काम निजी एजेंसियों के जरिए कराता है. कई मामलों में इन एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठे हैं. हालिया 14वीं JPSC परीक्षा में भी परीक्षा संचालन से जुड़ी एजेंसी जांच के दायरे में है, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हुई.

पेपर और OMR शीट

परीक्षा की गोपनीयता बनाए रखना किसी भी भर्ती का सबसे अहम हिस्सा होता है. लेकिन JPSC की कई परीक्षाओं में प्रश्न पत्र, OMR शीट और परीक्षा डेटा की सुरक्षा को लेकर विवाद हुए हैं. 14वीं JPSC में कुछ OMR शीट सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद अभ्यर्थियों ने पारदर्शिता पर सवाल उठाए। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है.

आंसर-की को लेकर आपत्तियां

कई परीक्षाओं में मॉडल आंसर-की जारी होने के बाद बड़ी संख्या में आपत्तियां आईं हैं. 11वीं से 13वीं संयुक्त परीक्षा में आयोग को छात्रों के विरोध के बाद आंसर-की में संशोधन करना पड़ा. इससे मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए.

रिजल्ट को लेकर भी अभ्यर्थियों उठाए सवाल

JPSC के कई परिणाम विवादों में रहे हैं. 7वीं से 10वीं संयुक्त परीक्षा में लगातार रोल नंबर वाले अभ्यर्थियों के चयन और OMR से जुड़े आरोपों ने बड़ा विवाद खड़ा किया. इसके बाद छात्रों ने आंदोलन किया और मामला अदालत तक पहुंचा.

रिजर्वेशन रूल और मेरिट सूची को लेकर विवाद

रिजर्वेशन और मेरिट सूची को लेकर भी कई बार विवाद हुए. 5वीं JPSC परीक्षा में अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि आरक्षण नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया. इस मुद्दे पर भी न्यायालय में सुनवाई हुई।

परीक्षा के दौरान नियमों में बदलाव

JPSC के कई फैसलों को अदालत में चुनौती दिया गया है. छठी JPSC परीक्षा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है,जब आयोग ने मुख्य परीक्षा के बाद क्वालीफाइंग पेपर के अंक भी मेरिट में जोड़ दिए. हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप नहीं माना और मेरिट सूची रद्द कर दी.

भर्ती प्रक्रिया में देरी

JPSC की एक बड़ी चुनौती समय पर भर्ती पूरी नहीं कर पाना भी रही है. कई परीक्षाओं में विज्ञापन से अंतिम नियुक्ति तक चार से छह साल लग गए. छठी JPSC इसका प्रमुख उदाहरण है, जबकि 14वीं JPSC की मुख्य परीक्षा भी विवाद के बाद स्थगित करनी पड़ी. इससे हजारों अभ्यर्थियों की तैयारी और करियर प्रभावित हुआ.

पिछले दो दशकों का रिकॉर्ड बताता है कि JPSC में विवाद किसी एक परीक्षा या एक आयोग तक सीमित नहीं रहे. अलग-अलग समय में विवादों की वजहें बदलती रहीं, लेकिन पारदर्शिता, मूल्यांकन, नियमों की स्पष्टता और समय पर भर्ती पूरी करने जैसे मुद्दे लगातार सामने आते रहे. यही कारण है कि हर नए विवाद के साथ अभ्यर्थियों का भरोसा फिर से परीक्षा प्रक्रिया पर सवालों के घेरे में आ जाता है.

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By गौतम कुमार

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