रांची की सतीश कुमार की रिपोर्ट
Jharkhand Groundwater Recharge : झारखंड में लगातार गिरते भूजल स्तर (ग्राउंड वाटर) को सुधारने के लिए पेयजल और स्वच्छता विभाग ने महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है. राज्य सरकार वर्षों से बेकार पड़े चापानलों को अब ‘रिचार्ज पिट’ (भूजल पुनर्भरण गड्ढा) में तब्दील करेगी. इस योजना के माध्यम से बारिश के पानी को सीधे जमीन के भीतर पहुंचाकर वाटर लेवल को मेंटेन किया जाएगा. विभाग ने इस संबंध में प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे जल्द ही राज्य कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा.
जर्जर चापाकलों की सूची तैयार, रिचार्ज पिट योजना पर जोर
योजना को धरातल पर उतारने के लिए विभाग ने सभी प्रमंडलों से ऐसे जर्जर चापानलों की सूची मांगी है, जिनका पिछले 25-30 वर्षों से कोई उपयोग नहीं हो रहा है. इसके साथ ही इन चापानलों की भौगोलिक स्थिति की भी जानकारी मांगी गई है, जिससे भविष्य में काम शुरू करने पर कोई तकनीकी अड़चन न आए. अधिकारियों को विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि चयनित चापाकल किसी के घर के अंदर या चहारदीवारी के बेहद करीब न स्थित हों. जानकारी के मुताबिक, एक रिचार्ज पिट को तैयार करने में लगभग 80 से 82 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान है.
राज्य में चार वर्षों में 2.29 प्रतिशत बड़ी भूजल निकासी
सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की ओर से नवंबर 2025 में जारी सर्वे रिपोर्ट के आंकड़े झारखंड के लिए चिंताजनक हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 की तुलना में झारखंड में भूजल की निकासी में 2.29 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साल 2020 में जहां भूजल निकासी 29.13 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष 2024 में यह बढ़कर 31.42 प्रतिशत (1.81 बिलियन क्यूबिक मीटर) तक पहुंच गई है. बोर्ड ने राज्य को 263 यूनिटों में बांटकर यह सर्वे किया था, जिसमें पाया गया कि धनबाद और कोडरमा में सबसे ज्यादा जल दोहन हो रहा है. धनबाद में 73.24 प्रतिशत और कोडरमा में 65.74 प्रतिशत भूजल निकाला जा चुका है. रिपोर्ट में रांची (शहरी), सिल्ली, रामगढ़, जयनगर, धनबाद (शहरी) और तोपचांची सहित छह प्रमुख यूनिटों को “क्रिटिकल” (अत्यंत चिंताजनक) और 12 अन्य यूनिटों को “सेमी क्रिटिकल” श्रेणी में रखा गया है.
रिचार्ज पिट क्या है और काम कैसे करता है?
रिचार्ज पिट वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) की एक सरल और प्राकृतिक तकनीक है. इसका मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर बर्बाद होने से रोकना और उसे सीधे जमीन के भीतर पहुंचाना है. इसके तहत चापानल के पास जमीन में एक से तीन मीटर गहरा और चौड़ा गड्डा खोदा जाता है. इस गड्ढे में फिल्टर भीडिया की परतें बनाई जाती है. सबसे नीचे बड़े पत्थर (बोल्डर्स), बीच में छोटे पत्थर (कंकड/बोवल) और सबसे ऊपर मोटी रेत (लैंड) भरी जाती है, बारिश का पानी जब इसमें आता है, तो इन परतों से उनकर पूरी तरह शुद्ध हो जाता है और धीरे-धीरे रिसकर सीधे बाउंड कटर टेक्ल में समा जाता है.
पेयजल एवं स्वाता मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने कहा
झारखंड में तेजी से गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए वर्षों से बेकार पड़े मृतपाय चापानलों में रिचार्ज पिट तैयार करने की योजना बनाई गई है. सभी प्रमंडलों से बेकार पड़े चापानलों की सूची मांगी गई है. जल्द ही इस प्रस्ताव को कैबिनेट की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा, जिससे इस पर जल्दी कार्रवाई शुरू की जा सके.
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