बीरभूम से पालकी में खैराडीह लाकर स्थापित हुईं मां

मंझलाडीह गांव के सिंह परिवार द्वारा 553 वर्ष पूर्व बीरभूम के खैराडीह से पालकी लाकर स्थापित मंझलाडीह दुर्गा मंदिर अति प्राचीन और आस्था का केंद्र है। मंदिर की स्थापना वंशज आनंद सिंह ने संतान प्राप्ति की कामना से की थी। यहां प्रतिदिन विधिपूर्वक पूजा होती है और भक्त भारी संख्या में आते हैं। दुर्गा पूजा के समय षष्ठी पर देवी कात्यायनी की पूजा और महासप्तमी को कलश यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें नवपत्रिका का विधिविधान स्नान और मंदिर में स्थापना की जाती है। नवपत्रिका को नौ स्वरूपों के प्रतीक पत्तों से स्नान कर दुल्हन की भांति सजाया जाता है। दशहरा पर भजन-कीर्तन व मेला लगता है, जो क्षेत्र में धार्मिक उत्सव का प्रमुख हिस्सा है।

– बीरभुम के खैराडीह दुर्गा मंदिर से पालकी से लाकर मंझलाडीह में किया था स्थापना प्रतिनिधि, बिंदापाथर. मंझलाडीह गांव स्थित सिंह परिवार की दुर्गा पूजा थाना क्षेत्र की अति प्राचीन पूजाओं में से एक है. यहां का दुर्गा मंदिर लगभग 553 वर्ष पुराना है और क्षेत्रवासियों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है. सिंह परिवार के अनुसार उनका वंश मंझलाडीह, लकड़ाकुंदा, नामुजलांई और अम्बाबांक गांवों में फैला हुआ है. मंदिर की स्थापना वंशज आनंद सिंह ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के खैराडीह स्थित दुर्गा मंदिर से पालकी में मूर्ति लाकर की थी. उन्होंने संतान प्राप्ति की कामना से मां दुर्गा की आराधना की थी, जिसके बाद उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम देवी सिंह रखा गया. मंदिर में प्रतिदिन विधिविधानपूर्वक पूजा होती है और श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं. मान्यता है कि यहां भक्तिभाव से पूजा करने पर मां दुर्गा की कृपा अवश्य मिलती है. दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां विशेष उत्साह रहता है. षष्ठी तिथि को देवी कात्यायनी की पूजा और बिल्वाभिमंत्रण होता है, जिससे पूजा का आरंभ माना जाता है. महासप्तमी तिथि को कलश यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें नवपत्रिका को पालकी में लाया जाता है. नवपत्रिका का स्नान सिंह परिवार के पहाड़ी जलाशय पर विधिविधानपूर्वक किया जाता है. इसमें केले, कच्वी, हल्दी, जौ, बेल पत्र, अनार, अशोक, अरूम और धान के पत्ते शामिल होते हैं, जो मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माने जाते हैं. इन पत्तियों को गंगाजल, बारिश का पानी, सरस्वती नदी, समुद्र, कमल तालाब और झरने के जल से स्नान कराया जाता है. फिर नवपत्रिका को लाल पाड़ की साड़ी पहनाकर दुल्हन की तरह सजाया जाता है और मंदिर में स्थापना की जाती है. दशहरा पर्व पर मंदिर प्रांगण में भजन-कीर्तन और मेले का आयोजन होता है. इस वर्ष भी तैयारियां जोरों पर हैं और क्षेत्र में धार्मिक उत्सव का माहौल बना हुआ है.

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Published by: Umesh kumar

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