राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के बाद क्या है रवि राज मुर्मू का अगला कदम ? प्रभात खबर से खास बातचीत में बतायी भविष्य की योजना

संताली लघु फिल्म ‘आंगेन’ के निर्देशक रवि राज मुर्मू ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के बाद अपनी संघर्ष भरी यात्रा, फिल्म के पीछे की सोच और संताली सिनेमा की संभावनाओं पर प्रभात खबर से खास बातचीत की.

जमशेदपुर : जादूगोड़ा के रवि राज मुर्मू के लिए मंगलवार का दिन सिर्फ एक पुरस्कार मिलने का दिन नहीं था, बल्कि वर्षों के संघर्ष, सपनों और अपनी मिट्टी से जुड़ी कहानियों के राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का क्षण था. संताली लघु फिल्म ‘आंगेन’ के निर्देशन के लिए उन्हें 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में ‘बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर’ (नॉन-फीचर) पुरस्कार से सम्मानित किया गया. गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया.

राष्ट्रपति से पुरस्कार लेते रवि राज मुर्मू.

भ‍विष्य की योजनाओं पर प्रभात खबर से खुलकर की बात

सीमित संसाधनों के बीच संताली भाषा और स्थानीय परिवेश में फिल्म बनाने से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंचने का यह सफर आसान नहीं रहा. रवि राज मुर्मू ने प्रभात खबर से खास बातचीत में अपने संघर्ष, ‘आंगेन’ के पीछे की सोच, संताली सिनेमा की संभावनाओं और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर बात की. पढ़िए, उन्हीं की जुबानी उनके सफर की कहानी...

सवाल : राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद सबसे पहला विचार क्या आया?

रवि राज मुर्मू : यह मेरे लिए बेहद भावुक करने वाला क्षण था. जब राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार मिला, तो संघर्ष के वे सभी दिन आंखों के सामने आ गये, जब सीमित संसाधनों के बीच फिल्म बनाने का सपना देखा था. उस समय लगा कि मेहनत और धैर्य का परिणाम सामने आया है.

सवाल : ‘आंगेन’ बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया?

रवि राज मुर्मू : मैं संताली समाज, गांव के जीवन और अपनी संस्कृति के बीच पला-बढ़ा हूं. हमारे आसपास ऐसी कई कहानियां हैं, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा में जीवित हैं. मुझे लगा कि इन कहानियों को फिल्म के माध्यम से दर्ज किया जाना चाहिए. इसी सोच से ‘आंगेन’ की शुरुआत हुई.

सवाल : फिल्म बनाने के शुरुआती दौर में सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?

रवि राज मुर्मू : सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की थी. फिल्म बनाना आसान काम नहीं है. तकनीकी व्यवस्था, कलाकार, लोकेशन और आर्थिक जरूरतें, सभी अपने आप में चुनौती थीं. लेकिन कहानी पर विश्वास था. इसलिए मुश्किलें आयीं, फिर भी काम आगे बढ़ता रहा.

फिल्म शूटिंग के दाैरान रवि राज मुर्मू. (फाइल फाेटो)

सवाल : संताली भाषा में फिल्म बनाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?

रवि राज मुर्मू : संताली में फिल्म बनाना मेरे लिए अलग और खास अनुभव रहा. सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि कहानी की आत्मा और भाषा दोनों स्वाभाविक रहें. मैं चाहता था कि फिल्म देखते हुए संताली समाज के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और परिवेश की झलक महसूस हो.

सवाल : संघर्ष के दिनों में परिवार और समाज से कितना सहयोग मिला?

रवि राज मुर्मू : परिवार और समाज का सहयोग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा. कई बार परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं, लेकिन लोगों ने हौसला दिया. इसी सहयोग ने आगे बढ़ने की ताकत दी. राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि यह उपलब्धि अकेले मेरी नहीं है.

सवाल : ‘आंगेन’ में ऐसा क्या है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी?

रवि राज मुर्मू : फिल्म की कहानी अपनी जमीन से जुड़ी है. इसमें संताली समाज की लोककथा, संस्कृति और ग्रामीण जीवन के तत्व हैं. मेरा प्रयास रहा कि स्थानीय कहानी को उसकी मौलिकता के साथ प्रस्तुत किया जाये और उसे बनावटी तरीके से पेश न किया जाये.

सवाल : राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद संताली सिनेमा के लिए क्या उम्मीद देखते हैं?

रवि राज मुर्मू : मुझे उम्मीद है कि संताली भाषा में फिल्म बनाने वाले युवाओं को इससे प्रोत्साहन मिलेगा. हमारे पास कहानियों की कोई कमी नहीं है. जरूरत है कि उन कहानियों को अच्छी तैयारी और तकनीक के साथ दर्शकों तक पहुंचाया जाये. अगर युवाओं को सही अवसर मिले, तो संताली सिनेमा में काफी संभावनाएं हैं.

सवाल : युवा संताली फिल्मकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

रवि राज मुर्मू : अपनी भाषा और अपनी कहानी पर विश्वास रखें. संसाधन कम हों, तब भी प्रयास बंद नहीं करना चाहिए. शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सोच बड़ी होनी चाहिए. लगातार सीखते रहें और काम करते रहें। यही आगे बढ़ने का रास्ता है.

फिल्म का पोस्टर.

सवाल : आपके लिए ‘आंगेन’ सिर्फ एक फिल्म है या इससे कुछ बड़ा जुड़ा है?

रवि राज मुर्मू : मेरे लिए ‘आंगेन’ अपनी भाषा और समाज से जुड़ने का माध्यम है. इस फिल्म के जरिये मैं यह बताना चाहता था कि हमारी स्थानीय कहानियों में भी इतनी ताकत है कि उन्हें बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है. मेरे लिए यह फिल्म अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश भी है.

सवाल : राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद आगे की क्या योजना है?

रवि राज मुर्मू : आगे भी संताली और आदिवासी समाज से जुड़ी कहानियों पर काम करना चाहता हूं. मेरा प्रयास रहेगा कि ऐसी फिल्में बनें, जिनमें मनोरंजन के साथ हमारी भाषा, संस्कृति और समाज की वास्तविक तस्वीर भी दिखाई दे. मैं चाहता हूं कि स्थानीय कहानियां बड़े मंच तक पहुंचें और ज्यादा से ज्यादा लोग उन्हें जानें और समझें.

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लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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