jamshedpur news : नदी-पर्वत को बचाने के लिए समाज, राज्य और संतों को मिलकर काम करना होगा : राजेंद्र सिंह

नदी और पर्वत पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में जल पुरुष सहित अन्य पर्यावरणविद् ने रखे विचार

jamshedpur news : नदी और पर्वत पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुक्रवार को बिष्टुपुर स्थित एमएनपीएस सभागार में आगाज हुआ. इसका मकसद नदी और पर्वत के लिए बने कानून के मसौदे पर बातचीत करना और इस पर सुझाव आमंत्रित करना है. कई जगह डिस्कशन करने के बाद नदी और पहाड़ों पर कानून का प्रारूप बनाया गया है. इस अवसर पर जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि झारखंड की भौगोलिक परिस्थिति को देखते हुए जल, पहाड़ों के संरक्षण के लिए यहां समाज, राज्य और संतों को मिलकर काम करना होगा. इसके लिए प्रदेश को ठेकेदारों से मुक्त और सामुदायिक विक्रेंद्रित करना होगा. उन्होंने कहा कि झारखंड भगवान का लाडला बेटा है. यहां झार और मिट्टी है. इसे पानीदार बनाना आसान है. उन्होंने कहा कि वे 23 नदियों को पुनर्जीवित कर चुके हैं. ये सभी नदियां राजस्थान की हैं, तो सुवर्णरेखा और खरकई नदी को ठीक क्यों नहीं किया जा सकता है? अच्छे और गंदे को छोड़ दीजिए, नदी में केवल वर्षा जल जाये, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए. अमृत में जहर नहीं मिलाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि नदी में गंदा पानी डालने वाले को सजाए मौत हो.

नदियों-पहाड़ों को संरक्षित करने की बात करता है संविधान

राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदी और पहाड़ हमारे ज्ञान के तंत्र हैं, जो नष्ट हो रहे हैं. हमारे यहां एयर पॉल्यूशन एक्ट है, जंगल के लिए भी कानून बने हैं, लेकिन नदी और पहाड़ के लिए अभी तक कोई कानून नहीं बना है. नदी और पहाड़ तो धरती के हृदय हैं. इसके लिए तो कानून बनना ही चाहिए. इसकी बात हमलोग इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि इसको बचाने की व्यवस्था हमारे संविधान में है. संविधान सभी प्राणियों के संरक्षित और सुरक्षित रहने की बात करता है. संविधान की धारा 21 और 41 में जीवन को बचाने की जिम्मेदारी है, जिसमें पेड़-पौधे, जीव-जंतु सभी शामिल हैं.

पानी चाहिए तो पहाड़ को बचाना होगा

उन्होंने कहा कि पर्वत मां के स्तन के समान हैं, जो समुद्र को लेकर धरती पर विराजते हैं. इसलिए जो इसे नष्ट करता है, धरती मां उसे नष्ट कर देगी. यह बात अथर्ववेद में कही गयी है. हमें संविधान के दायित्व को समझना होगा. जो कहता है कि धरती को लिविंगेबल बनायेंगे. इसलिए नदी और पहाड़ के संरक्षण के लिए हमें एक्ट चाहिए. उन्होंने कहा कि पानी चाहिए, तो पहाड़ को बचाना ही होगा.

सत्ता से विरक्ति का भाव हो

उन्होंने ओडिशा का उदाहरण देकर समझाया कि वहां पहाड़ों को काटने का लीज ले लिया गया था. आदिवासियों ने कहा कि पर्वत हमारे देवता हैं. इसे हम काटने नहीं देंगे और वे जीत गये. उन्होंने कहा कि सत्ता से विरक्ति के भाव से हमें जीना होगा. हम प्रकृति को क्या दे सकते हैं यह भाव होना चाहिए. इसके लिए जीवन दांव पर लगाना होता है. अरावली पर्वत को बचाने के लिए उन्होंने वर्ष 1980 के दशक में लड़ाई लड़ी. जिस कारण 28000 खदानें बंद हो सकी. लेकिन, चार माह पहले शीर्ष न्यायालय ने फैसला दिया कि 100 मीटर से जो ऊंचा है, वही अरावली पहाड़ है, बाकी नहीं. यह दृष्टि दोहन की नहीं, शोषण की है.

लोगों की जरूरत को समझकर कानून बने

मीडिया से बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा कि विकास ज्ञान, प्रकृति और संस्कृति को बिगाड़ रहा है. उन्होंने कहा कि अगले कुछ सालों में पानी संरक्षण की तैयारी नहीं कर लेते हैं, तो हमें भी पानी के लिए दूसरे देशों का रुख करना होगा. उन्होंने कहा कि ब्यूरोक्रेसी और ज्यूडिशियरी मिलकर कानून बनाते हैं. लेकिन, लोगों की जरूरत को समझकर कानून बनाने की जरूरत है. प्रकृति जीवनीय बने इस पर काम नहीं हो रहा है. इस दिशा में हमारा यह छोटा सा प्रयास है. हम प्रकृति से क्षमा मांगकर जीने वाले हैं. हमारे शास्त्रों में कहा गया है, समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडले/ विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे. सुप्रीम कोर्ट संविधान को संरक्षित करता है. जिसमें नदी और पर्वत के संरक्षण की बात है. उन्होंने कहा कि 23 मई के बाद उक्त मसौदे को देशभर में आंदोलन बनाया जायेगा. इसकी शुरुआत कर्नाटक से होगी. फिर इसे संसद ले जाया जायेगा. उन्होंने कहा कि क्रॉकरोच वाला स्टेटमेंट ठीक नहीं है. इस दौरान प्रसेनजित सरकार, आकाश जायसवाल और शिवम ठाकुर की खरकई नदी पर आधारित पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया.

कानून बनेंगे, तो नदी-पहाड़ बचेंगे : वी गोपाला गौड़ा

सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश वी गोपाला गौड़ा ने कहा कि 77 साल बीत गये, लेकिन हमलोग पहाड़ों और नदियों के लिए कोई कानून न ला सके. देश में एक से एक बुद्धिजीवी, न्यायाधीश, टेक्नोक्रेट हैं, फिर भी पहाड़ों और नदियों के लिए कोई कानून नहीं है. उन्होंने कहा कि जमशेदपुर में हमलोग इस कानून पर काम कर रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रपति से इस पर संज्ञान लेने की अपील की. विधेयक संसद से ही पास होगा. उन्होंने कहा कि नदी और पर्वतों के लिए नियम नहीं बनेंगे, तो ये लुप्त हो जायेंगे. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 2004 और 2023 में संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था, उसी प्रकार पहाड़-नदी पर कानून बनाने के लिए संसद का विशेष सत्र होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को भी सक्रिय होना चाहिए.

2005 तक बस्तीवाले सुवर्णरेखा पर निर्भर थे : सरयू

विधायक सरयू राय ने कहा कि वन कानून से पहाड़ और और सिंचाई विभाग के कानून से नदी संरक्षित नहीं हो सकती. इसके लिए अलग से कानून बनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 और 2005 तक बस्ती वाले सुवर्णरेखा नदी पर निर्भर थे. आज नदी का पानी गंदा हो गया है. बस्तीवासी नदी में केवल स्नानभर कर पाते हैं. आज सुवर्णरेखा की स्थिति अत्यंत खराब हो गयी है. साहेबगंज में जो पहाड़ हैं, उसे बेतरतीब तरीके से काटा जा रहा है. हमलोगों ने कानून का ड्राफ्ट बनाया है. उसमें सुधार की गुंजाइश है. जरूरी सुधारों-सुझावों को लागू किया जायेगा.

1978 में पुल के ऊपर से बह रही थी सुवर्णरेखा : दिनेश मिश्र

पर्यावरणविद् दिनेश मिश्र ने कहा कि हम नदी को मां मानते हैं, तो मां को भला संसाधन के रूप में कौन देखता है? इसका शोषण नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि नदी के साथ-साथ हमें पहाड़ों का भी शोषण नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि वर्ष 1978 में सुवर्णरेखा नदी नीचे वाले पुल के ऊपर से बह रही थी. आज कहां चली गयी है सुवर्णरेखा.

नौजवान आयें आगे

जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिशेट्टी सत्यनारायणा ने कहा कि हमें पहाड़ों को हर हाल में बचाना होगा. उन्होंने कहा कि नौजवान ही इसे बचा सकते हैं. आइआइटी (आइएसएम, धनबाद) के मिशन वाइ के संयोजक प्रो अंशुमाली ने कहा कि दामोदर नद की लंबाई 70 फीसद कम हो गयी है. हमें दामोदर को उसके पुराने स्वरूप में लाना होगा. युगांतर प्रकृति के अध्यक्ष अंशुल शरण ने स्वागत भाषण दिया. अतिथियों का शॉल, स्मृति चिह्न और पौधा देकर स्वागत किया गया. कार्यक्रम का संचालन मनोज सिंह ने किया. सुवर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट के ट्रस्टी अशोक गोयल ने धन्यवाद ज्ञापन किया.

तकनीकी सत्र में संरक्षण, संवर्द्धन व सुरक्षा अधिनियम पर हुई चर्चा

प्रथम तकनीकी सत्र में पर्वत और जल संरक्षण, संवर्द्धन व सुरक्षा अधिनियम की आवश्यकता विषय पर चर्चा हुई. पत्रकार दीपक पर्वतियार ने कहा कि पर्यावरण से संबंधित कानून तो बनते हैं, लेकिन हालात वैसे ही हो जाते हैं, जो पहले थे. डॉ रामबूझ ने कहा कि नदियां प्रदूषित हो गयी हैं. संविधान में कहा गया कि इंसानों को नदियों को प्रदूषित नहीं करना है. डॉ राकेश कुमार सिंह ने कहा कि पर्यावरण से संबंधित कई कानून हैं. इन कानूनों के रहते न पहाड़ बच रहे हैं, न ही कोई नदी. इसके पीछे का मूल कारण इनकी मॉनीटरिंग करने वाले संस्थान का फेल होना है. उन्होंने कहा कि 31 मार्च को जमशेदपुर में कई टन मछलियां मर गयीं. लेकिन, इसको लेकर कोई आवाज नहीं उठी. डॉ समीर ने कहा कि हमें इस बात पर काम करना होगा कि नदी को स्वस्थ कैसे बनाया जाये. उन्होंने गंडक नदी पर फोकस्ड प्रजेंटेशन भी दिया. डॉ पीयूष कांत पांडेय ने कहा कि पहाड़ों और नदियों के लिए कानून बनना ही चाहिए. अगर पहाड़ न हों तो जल भी नहीं होगा. तरुण भारत संघ, आइआइटी (आइएसएम) धनबाद, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, जल बिरादरी और मिशन वाइ के संयुक्त तत्वावधान में यह सम्मेलन हो रहा है. इसमें देशभर के डेलिगेट्स शामिल हुए. 23 मई को सुबह 9:30 बजे सम्मेलन शुरू होगा. समापन अपराह्न 2:30 बजे होगा.

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Author: AKHILESH KUMAR

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