जमशेदपुर: झारखंड के सरकारी स्कूलों में बच्चों को हुनर सिखाने और उनहें रोजगार के लिए तैयार करने की कोशिश जमीन पर पहुंच तो रही है, लेकिन पढ़ाई और रोजगार के बीच की सबसे अहम कड़ी अभी भी कमजोर है, राज्य में बड़ी संख्या में विद्यार्थी वोकेशनल शिक्षा ले रहे हैं, मगर पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम है.
10वीं में वोकेशनल शिक्षा लेने वाले 34,114 विद्यार्थियों में सिर्फ 519 यानी 15 प्रतिशत को प्लेसमेंट मिला. वहीं 12वीं में 35,471 विद्यार्थियों में केवल 692 यानी 2 प्रतिशत विद्याची ही नौकरी हासिल कर सके. रोजगार के साथ-साथ स्वरोजगार की तस्वीर भी बहुत उत्साहजनक नहीं है. 10वीं के 34,114 विद्यार्थियों में 1,258 यानी 3.7 प्रतिशत विद्यार्थी स्वरोजगार से जुड़े.
जबकि 12वीं के 35,471 विद्यार्थियों में 1,710 यानी 4.8 प्रतिशत ने स्वरोजगार शुरू किया. यानी वोकेशनल शिक्षा लेने वाले विद्यार्थियों में बड़ी संख्या ऐसी है, जिनकी पढ़ाई पूरी होने के चाद नौकरी या अपना काम शुरू करने की स्थिति स्पष्ट नहीं है. इस बात का खुलासा स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव उमा शंकर सिंह ने सभी जिले के उपायुक्त व जिला शिक्षा पदाधिकारियों को भेजी गयी परफॉर्मेंस हेडिंग इंडेक्स 2.0 की रिपोर्ट से हुआ.
स्कूलों में वोकेशनल कोर्स की पहुंच भी अभी चौथाई से कुछ ज्यादा
रिपोर्ट के अनुसार, सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर के 3,280 सरकारी स्कूलों में से सिर्फ 844 स्कूलों यानी 25.7 प्रतिशत में एनएसक्यूएफ (नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क/राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचा) के तहत कोई वोकेशनल कोर्स संचालित हो रहा है. केवल सरकारी स्कूलों को देखें तो 2,877 में से 803 यानी 27.9 प्रतिशत स्कूलों में वोकेशनल कोर्स उपलब्ध है.
सबसे गंभीर बात यह है कि रिपोर्ट में शामिल 164 सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में से किसी में भी वोकेशनल कोर्स उपलब्ध नहीं है. यानी राज्य में अभी लगभग तीन-चौथाई सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां सेकेंडरी या हायर सेकेंडरी स्तर पर विद्यार्थियों को एनएसक्यूएफ आधारित वोकेशनल कोर्स का अवसर ही नहीं मिल रहा.
पाकुड़ सबसे आगे, पूर्वी सिंहभूम 21.9 प्रतिशत पर
जिलावार स्थिति में वोकेशनल शिक्षा की पहुंच में बड़ा अंतर है. सरकारी स्कूलों में एनएसक्यूएफ आधारित वोकेशनल कोर्स उपलब्ध कराने के मामले में पाकुड़ 36.4 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है. इसके बाद रांची 28.6, कोडरमा 32.0, लोहरदगा 30.6, हजारीबाग 29.1, चतरा 29.3 और गढ़वा 28.7 प्रतिशत पर हैं. पूर्वी सिंहभूम में 196 सरकारी स्कूलों में 43 यानी 21.9 प्रतिशत स्कूलों में वोकेशनल कोर्स उपलब्ध है. पश्चिमी सिंहभूम में यह आंकड़ा 23.4 प्रतिशत, सरायकेला-खरसावां में 27.8, बोकारो में 27.7 और धनबाद में 24.7 प्रतिशत है. सबसे नीचे खूंटी 19.3 और जामताड़ा 20.5 प्रतिशत पर हैं.
पढ़ाई के बाद नौकरी में सरायकेला सबसे आगे
कक्षा 10 के बाद प्लेसमेंट के मामले में सरायकेला-खरसावां सबसे सिर्फ 16 यानी 0.9 प्रतिशत विद्यार्थी स्वरोजगार से जुड़े. वहीं, 12वीं में देवघर 9.27 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है. गोड्डा 7.94, दुमका 7.65, सरायकेला-खरसावां 7.59, बोकारो 6.81 और गिरिडीह 6.65 प्रतिशत पर है. पूर्वी सिंहभूम में 2,299 में 79 यानी 3.44 प्रतिशत विद्यार्थी स्वरोजगार से जुड़े. सबसे खराब स्थिति खूंटी में रही, जहां 627 में केवल दो यानी 0.32 प्रतिशत विद्यार्थी स्वरोजगार से जुड़े, जबकि गढ़वा में 1,260 विद्यार्थियों में एक भी विद्यार्थी स्वरोजगार से नहीं जुड़ा आगे है.
यहां वोकेशनल शिक्षा लेने वाले 1,331 विद्यार्थियों में 111 यानी 8.3 प्रतिशत को प्लेसमेंट मिला. इसके बाद लातेहार 4.1, गोड्डा 3.3, गिरिडीह 3.2 और दुमका 3 प्रतिशत पर हैं. इसके उलट गुमला और पश्चिमी सिंहभूम में एक भी विद्यार्थी प्लेसमेंट हासिल नहीं कर सका. पूर्वी सिंहभूम में 1,584 विद्यार्थियों में सिर्फ 10 यानी 0.6 प्रतिशत, रांची में 2,368 में 11 यानी 0.5 प्रतिशत, बोकारो में 1,850 में 8 यानी 0.4 प्रतिशत और धनबाद में 1,302 में 14 यानी 1.1 प्रतिशत विद्यार्थियों को ही नौकरी मिली. राज्य का औसत महज 1.5 प्रतिशत रहा.
12वीं क्लास में भी नौकरी की राह आसान नहीं
12वीं के छात्रों में प्लेसमेंट का राज्य औसत थोड़ा बेहतर होकर 2% हुआ, लेकिन यह भी कम है. दुमका 4.8% के साथ पहले स्थान पर है. गोड्डा 4.6, बोकारो 4.5 और सरायकेला-खरसावां 4.5% पर है. पूर्वी सिंहभूम में 2,299 विद्यार्थियों में केवल 28 यानी 1.2 प्रतिशत को प्लेसमेंट मिला. रांची में 2,723 विद्यार्थियों में 14 यानी 0.5 प्रतिशत और धनबाद में 1,553 में 23 यानी 1.5 प्रतिशत को नौकरी मिली. खूंटी में 627 विद्यार्थियों में सिर्फ एक और पाकुड़ में 1,090 में सिर्फ एक विद्यार्थी प्लेसमेंट पा सका.
