जमशेदपुर: लौहनगरी और इसके आसपास के आदिवासी-मूलवासी बहुल ग्रामीण इलाकों में मां मनसा की पूजा को लेकर आस्था और भक्ति की अनूठी बयार बह रही है. भादो माह की संक्रांति के पावन अवसर पर सोमवार को शहर के भालूबासा, सीतारामडेरा, उलीडीह, शास्त्रीनगर, कुटकूडुंगरी, शंकोसाई, देवघर, डिमना, परसुडीह, सरजामदा, गदड़ा, डोमजुड़ी और मतलाडीह समेत विभिन्न बस्तियों में सुबह से ही चहल-पहल बनी हुई है. मां मनसा की मनमोहक प्रतिमाओं को वेदियों पर स्थापित कर दिया गया है. श्रद्धालु दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम को होने वाली महापूजा की तैयारियों में जुटे हैं, ताकि माता के चरणों में श्रद्धा निवेदित कर परिवार की सुख-समृद्धि और उन्नति की कामना कर सकें.
मनसा पूजा को लेकर बस्तियों में छाया भक्तिमय माहौल
जमशेदपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में मां मनसा पूजा का अपना एक खास सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है. पूजा स्थलों पर आकर्षक मंडप सजाये गये हैं, वहीं श्रद्धालुओं द्वारा नाग देवी मां मनसा को प्रसन्न करने के लिए दूध, केला, खीर, धूप-दीप और कमल पुष्प अर्पित करने का विधान शुरू हो चुका है. शाम ढलते ही ढोल-ढाक और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर महाआरती का आयोजन किया जाएगा. कई बस्तियों में गंतव्य स्थलों तक कलश यात्राएं निकाली गईं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भाग लिया.
कौन हैं मां मनसा व क्यों की जाती है इनकी आराधना?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां मनसा को नागों की देवी, महर्षि कश्यप की मानसी पुत्री और भगवान शिव की मानस पुत्री माना गया है. इन्हें सर्पदंश से रक्षा करने वाली और भक्तों की हर मनोकामना पूरी करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है. 'मनसा' का अर्थ मन की इच्छा से है; माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता का ध्यान और व्रत करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. कृषि प्रधान आदिवासी-मूलवासी समाज में बरसात के दिनों में विषैले जीवों और सर्पों से रक्षा के लिए प्राचीन काल से ही मां मनसा की उपासना की परंपरा चली आ रही है.
लोक मान्यता व मां मनसा की पौराणिक कथा
मां मनसा से जुड़ी लोककथाओं में चांद सौदागर और बिहुला-लखिंदर की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है. मान्यता है कि चांद सौदागर देवी मनसा की सर्वोच्चता स्वीकार नहीं करते थे, जिसके बाद उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अंततः बिहुला की अदम्य पतिव्रता और माता मनसा के प्रति अटूट भक्ति के कारण चांद सौदागर को मां मनसा की पूजा स्वीकार करनी पड़ी. तभी से समाज में यह अटूट विश्वास स्थापित हुआ कि माता मनसा की कृपा से मृतप्राय जीवन भी पुनः संवर जाता है और घर-परिवार में किसी प्रकार की विपत्ति या अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता.
कृषि व परिवार के कुशलक्षेम से जुड़ा है यह लोकपर्व
कोल्हान क्षेत्र में मां मनसा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक जीवन का एक अभिन्न अंग है. ग्रामीण और मूलवासी परिवारों का मानना है कि संक्रांति के दिन माता मनसा का पूजन करने से फसलों की रक्षा होती है, घर में अन्न-धन की बरकत बनी रहती है और वंश वृद्धि होती है. शाम को होने वाली विशेष पूजा के बाद श्रद्धालु व्रत तोड़कर महाप्रसाद ग्रहण करेंगे. कई स्थानों पर देर रात तक पारंपरिक मनसा मंगल गीतों का गायन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी निर्धारित किया गया है, जिसको लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है.
