जमशेदपुर : पूर्वी सिंहभूम के कुमीरमुड़ी गांव की मिट्टी, बचपन में बुजुर्गों से सुनी लोककथाएं और फिल्मों को समझने की जिज्ञासा...यही तीन चीजें धीरे-धीरे रवि राज मुर्मू के सपने की बुनियाद बनती चली गयीं. गांव के स्कूल से शुरू हुई पढ़ाई जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज तक पहुंची और फिर फिल्म की बारीकियां सीखने के लिए उन्हें पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) तक ले गयी. संघर्ष के इस लंबे सफर में उन्होंने फिल्म एडिटिंग सीखी, मुंबई में काम किया और बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रोजेक्ट्स से जुड़े. लेकिन, अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियां उनके भीतर हमेशा जीवित रहीं. इसी जुड़ाव ने जन्म दिया संताली लघु फिल्म ‘आंगेन’ को और यही फिल्म उन्हें राष्ट्रीय पहचान तक ले गयी.
गांव से शुरू हुआ सिनेमा का सफर
रवि राज मुर्मू की प्रारंभिक पढ़ाई गांव के स्कूल से हुई. इसके बाद उन्होंने जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के दौरान ही फिल्म निर्माण में उनकी रुचि गहराती गयी. फिल्मों को सिर्फ देखने के बजाय उनके पीछे की कहानी, तकनीक और निर्माण प्रक्रिया को समझने की चाह उन्हें आगे बढ़ाती रही. इसी जुनून के साथ उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे में 2016 से 2019 के बीच फिल्म एडिटिंग का प्रशिक्षण लिया. यहां उन्होंने सिनेमा को तकनीकी और रचनात्मक दोनों स्तरों पर समझने का अवसर पाया.
पुणे से मुंबई तक, बड़े प्रोजेक्ट्स का अनुभव
FTII से प्रशिक्षण लेने के बाद रवि राज मुर्मू ने मुंबई में रहकर फिल्म और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में काम किया. इस दौरान उन्होंने नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, जियो सिनेमा और विज्ञापन फिल्मों से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया. महानगर की व्यावसायिक फिल्मी दुनिया में काम करते हुए उन्हें सिनेमा के बड़े मंच और उसकी कार्यप्रणाली को करीब से समझने का मौका मिला. लेकिन इस व्यस्त पेशेवर दुनिया के बीच भी उनके भीतर अपने गांव की कहानियां और लोककथाएं लगातार जगह बनाती रहीं.
बुजुर्गों से सुनी कहानियां बनीं ‘आंगेन’ की ताकत
बचपन में गांव के बुजुर्गों से सुनी आदिवासी लोककथाओं ने रविराज के भीतर कहानी कहने की रुचि पैदा की थी. समय के साथ यही रुचि उनके सिनेमा का आधार बन गयी. उन्होंने अपनी संताली लघु फिल्म ‘आंगेन’ में इन्हीं अनुभवों और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पर्दे पर उतारने का प्रयास किया. सीमित संसाधनों के बीच तैयार हुई इस फिल्म ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. स्थानीय परिवेश और संताली संस्कृति से जुड़ी कहानी को सिनेमा के माध्यम से सामने लाने के प्रयास को व्यापक पहचान मिली.
‘आंगेन’ ने दिलाया राष्ट्रीय सम्मान
साल 2026 में रवि राज मुर्मू की मेहनत को बड़ी पहचान मिली. ‘आंगेन’ के लिए उन्हें 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का सम्मान मिला. गांव से शुरू हुआ सफर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तक पहुंचा तो यह उपलब्धि सिर्फ रविराज की व्यक्तिगत सफलता नहीं रही, बल्कि संताली भाषा और स्थानीय कहानियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गयी. रवि राज की कहानी बताती है कि सिनेमा की दुनिया में पहुंचने के लिए जरूरी नहीं कि शुरुआत किसी बड़े शहर से हो. कभी-कभी कहानी की सबसे मजबूत जमीन वहीं मिलती है, जहां बचपन बीता हो और जहां बुजुर्गों की सुनायी लोककथाएं मन में लंबे समय तक जिंदा रहती हैं.
करीम सिटी कॉलेज के लिए गर्व का क्षण : नेहा तिवारी
करीम सिटी कॉलेज के जन संचार विभाग की एचओडी नेहा तिवारी ने प्रभात खबर से खास बातचीत में बताया - विभाग की यात्रा करीब तीन दशक की है. इस दौरान विभाग ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. लेकिन, किसी छात्र का राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित होना पूरे विभाग के लिए गर्व का क्षण है. रवि राज मुर्मू को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह करीम सिटी कॉलेज और जन संचार विभाग के लिए भी गौरव की बात है. उन्होंने कहा - यह सम्मान विभाग के विद्यार्थियों को आगे बढ़ने और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करेगा.
