जमशेदपुर : झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने जमशेदपुर सर्किट हाउस में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों, नए कानूनी संशोधनों और आगामी परिसीमन पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा - केंद्र सरकार के नए संशोधन से झारखंड सरकार द्वारा खनिज क्षेत्रों पर लगाए जाने वाले सेस और टैक्स पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. इससे राज्य सरकार को सालाना करीब 14,000 करोड़ का भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है. राज्य के संवैधानिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए बंधु तिर्की ने 'समस्त आदिवासी समाज, झारखंड' के तत्वावधान में 30 अगस्त को रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में सुबह 11 बजे से 'आदिवासी एकता महाजुटान रैली' के आयोजन की घोषणा की. उन्होंने आदिवासी समाज के सभी वर्गों और जागरूक नागरिकों से इस महारैली में एकजुट होकर शामिल होने का आह्वान किया.
आदिवासी सीटों में किसी भी प्रकार की कमी बर्दाश्त नहीं
बंधु तिर्की ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित परिसीमन में अनुसूचित जनजाति (एसटी ) के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों में किसी भी प्रकार की कटौती स्वीकार नहीं की जायेगी. उन्होंने कहा - यदि परिसीमन प्रक्रिया के तहत कुल सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो एसटी आरक्षित सीटों में भी वर्तमान अनुपात के आधार पर समान वृद्धि सुनिश्चित होनी चाहिए.
बलिदान और जनसंख्या नियंत्रण के बदले 'राजनीतिक दंड' न मिले
पूर्व मंत्री ने रेखांकित किया कि देश और राज्य के विकास के लिए सबसे बड़ा त्याग आदिवासी समाज ने दिया है. खनन, रेलवे, राजमार्ग, बांध और बड़े उद्योगों के लिए लाखों आदिवासियों को अपनी जल, जंगल और जमीन से विस्थापित होना पड़ा. साथ ही आदिवासी समाज ने जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीतियों का भी पूरी निष्ठा से पालन किया है. ऐसे में केवल वर्तमान जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटें घटाना समाज को त्याग और नीतियों के पालन के बदले ‘राजनीतिक दंड’ देने के समान होगा. प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि खनिज सेस और टैक्स से जुड़े राज्य के अधिकारों की रक्षा हो, ताकि संभावित 14,000 करोड़ के वार्षिक नुकसान से बचा जा सके.
क्या है मांगें
एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में कोई कमी न हो और कुल सीटें बढ़ने पर समानुपातिक वृद्धि दी जाये. झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र, ऐतिहासिक विस्थापन, पलायन और सीएनटी-एसपीटी एक्ट जैसे संवैधानिक संरक्षण को परिसीमन का प्राथमिक आधार बनाया जाए. परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले आदिवासी समाज के जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और संवैधानिक विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया जाये.
