25 साल बाद इंकैब के पुनरुद्धार की आस, एनसीएलटी ने वेदांता के प्लान को दी मंजूरी

लगभग 25 साल से बंद पड़ी केबुल कंपनी (इंकैब) के कर्मचारियों के लिए उम्मीद की एक नयी किरण जगी है.

545 करोड़ का निवेश प्रस्ताव, कर्मियों के बकाया वेतन के साथ पीएफ व ग्रेच्युटी का होगा भुगतान

वरीय संवाददाता जमशेदपुर

लगभग 25 साल से बंद पड़ी केबुल कंपनी (इंकैब) के कर्मचारियों के लिए उम्मीद की एक नयी किरण जगी है. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने वेदांता लिमिटेड के पुनरुद्धार प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. सोमवार को सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया. अनुमान है कि दुर्गा पूजा से पहले अंतिम फैसला आ सकता है. यदि यह योजना अमल में आती है तो कंपनी को नया जीवन मिलेगा और सैकड़ों कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित होगा.

वेदांता का प्रस्ताव : 545 करोड़ का निवेश

वेदांता ने इंकैब को पुनर्जीवित करने के लिए 545 करोड़ रुपये का निवेश करने और कर्मचारियों को बकाया राशि चुकाने का प्रस्ताव दिया है. इस प्लान को इंकैब की कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (सीओसी) ने 99 प्रतिशत मतों से मंजूरी दी थी. इंडियन केबल वर्कर्स यूनियन के महामंत्री राम विनोद सिंह ने बताया कि एनसीएलटी से मंजूरी मिलने के बाद आइबीसी की धारा 53 के तहत कर्मचारियों को 24 महीने और ऑफिसर ग्रेड को 12 महीने का वेतन मिलेगा. साथ ही वेदांता ने पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य मदों में जमा राशि का अलग से भुगतान करने का आश्वासन भी दिया है.कंपनी का इतिहास : उत्थान से बंदी तक

इंकैब (पूर्व नाम केबुल कंपनी) की स्थापना 1920 में हुई थी. यह कंपनी कभी करोड़ों की आमदनी करती थी, लेकिन आर्थिक संकट के कारण 1988 में इसका नाम बदलकर इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड कर दिया गया. बाद में काशीनाथ तापुरिया और फिर मलेशियाई कंपनी लीडर यूनिवर्सल ने इसका अधिग्रहण किया.1999 में कंपनी प्रबंधन संकट में आया और दिसंबर 1999 तक कामकाज पूरी तरह ठप हो गया. अप्रैल 2000 से कंपनी बंद है. बंदी के समय जमशेदपुर में 1850 और देशभर में 2500 कर्मचारी कार्यरत थे.फैक्ट फाइल

बंद होने के समय कर्मचारी (जमशेदपुर) : 1450

वर्तमान में जमशेदपुर में : लगभग 1292

रिटायरमेंट के बाद शेष : लगभग 900

पुणे : 180 कर्मचारी

कोलकाता : 60 कर्मचारी

अन्य स्थान : 60 कर्मचारी

बंदी के समय संपत्ति (जमशेदपुर) : 120 करोड़

वर्तमान अनुमानित कीमत : लगभग 500 करोड़

मजदूरों का बकाया : 350–400 करोड़ रुपये

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Author: ASHOK JHA

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