आसेका ने संताली पुस्तकों को देवनागरी लिपि में छापने का किया विरोध

आसेका ने संताली पुस्तकों को देवनागरी लिपि में छापने का विरोध किया है। संघ ने मांग की है कि पुस्तकें ओलचिकी लिपि में ही प्रकाशित की जानी चाहिए।

वरीय संवाददाता, जमशेदपुर: घाटशिला स्थित माझी परगना बाखुल पावड़ा में रविवार को आसेका (आदिवासी सोशियो-एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोसिएशन) की ओर से अध्यक्ष सुभाष चंद्र मांडी की अध्यक्षता में बैठक हुई. इसमें संताली भाषा, संस्कृति समेत सामाजिक अन्य गतिविधियों पर चर्चा की गयी. इसमें वक्ताओं ने कहा कि एनसीइआरटी और जेसीइआरटी के द्वारा संताली पुस्तकों को देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया जा रहा है. यह अच्छी बात है, लेकिन इसमें कई गलतियां हैं, जो अर्थ को अनर्थ करने जैसा है.

इसका आसेका विरोध करता है. बैठक में निर्णय लिया गया कि आसेका की ओर से एनसीइआरटी और जेसीइआरटी के डायरेक्टर को मांग पत्र सौंपकर आपत्ति दर्ज करायी जायेगी. साथ ही उनसे मांग की जायेगी कि संताली पुस्तकों को ओलचिकी लिपि में प्रकाशित किया जाये. यदि ओलचिकी में संताली पुस्तकों को प्रकाशित नहीं किया जाता है, तो इसका पूरजोर विरोध किया जायेगा. आसेका महासचिव शंकर सोरेन ने बताया कि जल्द ही संघ का एक प्रतिनिधिमंडल एनसीइआरटी और जेसीइआरटी के डायरेक्टर से मिलेगा और उन्हें मांग पत्र सौंपेगा. इस अवसर पर संघ के महासचिव शंकर सोरेन, बायला सोरेन, बदेन चंद्र हांसदा, धानो राम टुडू, सालखू मुर्मू, कन्हाई लाल हेम्ब्रम, डोमान मांडी, रजनीकांत हांसदा, पीतांबर हांसदा, रबि हेंब्रम, लक्ष्मण सोरेन, कालीराम हेंब्रम, चरण हेंब्रम, अर्जुन सामद समेत अन्य मौजूद थे.


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लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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