हजारीबाग के बड़कागांव बाजारों में छाया 'बरसाती मटन', आयुर्वेद डॉक्टर ने बताए इसके फायदे

सावन का महीना शुरू होते ही बड़कागांव के बाजारों में 'फुटका' (रुगड़ा) की बिक्री ने रफ्तार पकड़ ली है. झारखंड में 'बरसाती मटन' के नाम से मशहूर यह प्राकृतिक मशरूम न सिर्फ स्वादिष्ट है, बल्कि कमाई का जरिया भी बन रहा है. जानिए इसके औषधीय गुण और कैसे ग्रामीण महिलाएं इससे आत्मनिर्भर बन रही हैं.

बड़कागांव से संजय सागर की रिपोर्ट

हजारीबाग : सावन का महीना शुरू होते ही बड़कागांव के दैनिक और साप्ताहिक बाजारों में 'फुटका' (रुगड़ा) की बिक्री ने रफ्तार पकड़ ली है. झारखंड में 'बरसाती मटन' के नाम से मशहूर फुटका के अलावा स्थानीय बाजारों में खुखड़ी और टेकनस की मांग भी चरम पर है. बारिश के मौसम में उगने वाले इस प्राकृतिक मशरूम के व्यवसाय से क्षेत्र के कई बेरोजगार युवक और ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं. अंबा टोला निवासी बुधन मांझी, कुमुद टुडू, शुक्री मुंडा, सुनीता देवी और प्रकाश महतो ने बताया कि वे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल जाते हैं और दोपहर तक फुटका, खुखड़ी व टेकनस चुनकर लौटते हैं. इसके बाद दोपहर तीन बजे से वे बाजारों में इन्हें बेचकर प्रतिदिन 5,000 से 10,000 रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं और इस काम में सबसे ज्यादा महिलाएं सक्रिय हैं.

सावन में मटन को दे रहा टक्कर

बाजार के मौजूदा भाव की बात करें तो बड़कागांव बाजार में फुटका 1,000 रुपये प्रति किलो, खुखड़ी 125 रुपये और टेकनस 225 रुपये तक बिक रहा है. मशरूम का यह प्राकृतिक व्यवसाय जून से शुरू होकर सितंबर माह तक चलता है. सावन के महीने में इसकी मांग आसमान छूने लगती है, क्योंकि इस दौरान मांसाहार छोड़ने वाले लोग विकल्प के तौर पर इसका सेवन करते हैं. स्वाद में बेहद लाजवाब और मटन जैसा टेक्सचर होने के कारण इसे शाकाहारियों का मटन भी कहा जाता है, जिसे लोग पराठा या रोटी के साथ बड़े चाव से खाते हैं.

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पोषक तत्वों का खजाना: कई बीमारियों में है रामबाण

बड़कागांव के आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अरुण महतो ने बताया कि रुगड़ा या फुटका केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर एक बेहतरीन सब्जी है. इसमें विटामिन बी-12, विटामिन बी-3, विटामिन सी, फॉस्फोरस, पोटेशियम, जिंक, आयरन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, फोलिक एसिड, कैल्शियम और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यही वजह है कि मानसून के दिनों में इसका सेवन सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है और यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है.

साल (सखुआ) के पेड़ों के नीचे जमीन के भीतर से निकलता है यह मशरूम

कांड़तरी वन संरक्षण समिति के पूर्व अध्यक्ष बालेश्वर महतो ने जानकारी दी कि फुटका, खुखड़ी और टेकनस आम मशरूम की तरह सतह पर नहीं, बल्कि जमीन के भीतर पैदा होते हैं. वह भी हर जगह नहीं, बल्कि सिर्फ साल (सखुआ) के वृक्षों के नीचे उगते हैं. बारिश के मौसम में जब जंगलों में बिजली कड़कती है और साल के पेड़ों के नीचे की जमीन में दरारें पड़ती हैं, तो पानी मिलते ही ये पनपने लगते हैं. जैसे ही ये पूरी तरह परिपक्व होते हैं, ग्रामीण जमीन खोदकर इन्हें सुरक्षित निकाल लेते हैं.

बड़कागांव के इन जंगलों और पहाड़ों में होता है बंपर उत्पादन

बड़कागांव क्षेत्र के डूमारो जंगल, महुदी पहाड़, बथनिया, चिनरीटांड़, सीकरी जंगल, जोराकाठ, बरवानिया, लौकुरा, भुरकुंडवा और पंकरी बरवाडीह जैसे घने जंगलों में तेज गर्जना और मूसलाधार बारिश के दौरान इसका प्राकृतिक उत्पादन सबसे अधिक होता है. इन इलाकों से भारी मात्रा में फुटका चुनकर स्थानीय बाजारों के साथ-साथ राज्य के दूसरे बड़े शहरों में भी भेजा जाता है.

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Published by: Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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