हजारीबाग(चरही). दुख की घड़ी में जब परिवार का एकलौता सहारा चला गया और घर का चूल्हा-चौका से लेकर खेत तक सब कुछ मानो ठहर गया, तब चरही कसियाडीह गांव के लोगों ने इंसानियत और सामाजिक एकजुटता की ऐसी मिसाल पेश की, जो समाज को प्रेरित करती है.दुख बांटने के लिए सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि साथ खड़े होने वाले हाथों की जरूरत होती है चरही पंचायत के सरबाहा टोला कासियाडीह में दर्जनों पुरुषों ने सामूहिक श्रमदान कर शोकाकुल बिरसा हांसदा के करीब एक एकड़ खेत में धान की रोपनी की.
16 अगस्त को छह वर्ष के बेटे की हुई थी मौत
16 अगस्त को बिरसा हांसदा के इकलौते छह वर्षीय बेटे का आकस्मिक निधन हो गया था. बेटे की मौत से पूरा परिवार गहरे सदमे में है. दुख की इस स्थिति में बिरसा ने इस वर्ष खेत में धान नहीं रोपने का निर्णय लिया. इसकी जानकारी मिलते ही गांव के लोग आगे आये. समाजसेवी चुनू हांसदा के नेतृत्व में ग्रामीणों ने तय किया कि दुखी परिवार को अकेला नहीं छोड़ा जायेगा.
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पहल आगे भी जारी रहेगी
ग्रामीणों ने बिना किसी मजदूरी या स्वार्थ के एकजुट होकर पूरे खेत में धान की रोपनी कर दी. खास बात यह रही कि क्षेत्र में सामान्यतः धान रोपनी का काम महिलाएं करती हैं और पुरुषों की भागीदारी कम रहती है. लेकिन कासियाडीह के पुरुषों ने खुद खेत में उतरकर सामाजिक सहयोग की नयी मिसाल कायम की. गांव के ही चुनू हांसदा ने कहा कि गांव के गरीब और दुखी परिवारों की मदद के लिए श्रमदान की यह पहल आगे भी जारी रहेगी. मौके पर राधे हांसदा, नरेश हांसदा, अर्जुन हांसदा, सालखन सोरेन, अनूप तिग्गा सहित कई ग्रामीण शामिल थे.
