आधुनिकता की दौड़ में कहां खो गया गांव का गौ बथान? वीरान पड़े ठिकानों के साथ मिट रही सदियों पुरानी परंपरा

एक समय था जब गांवों की सुबह गौ बथान से शुरू होती थी, जो सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का केंद्र था. आज वही स्थान वीरान पड़े हैं, और सदियों पुरानी परंपराएं लुप्त हो रही हैं. आधुनिकता की दौड़ में हम क्या खो रहे हैं, इसका एक मार्मिक चित्रण.

डुमरी से प्रेम प्रकाश भगत की रिपोर्ट

डुमरी.कभी गांवों की सुबह गौ बथान से शुरू होती थी. सूरज की पहली किरण के साथ गायों की घंटियों की मधुर ध्वनि, चरवाहों की पुकार और ग्रामीणों की चहल-पहल पूरे गांव को जीवंत बना देती थी. आज वही गौ बथान वीरान पड़े हैं. अब उन सभी जगहों पर झाड़ियां उग आयी है. इसके साथ ही ग्रामीण समाज की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी परंपराएं भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है.

सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का केंद्र था गौ बथान

गौ बथान केवल मवेशियों को रखने का स्थान नहीं था, बल्कि गांव की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का केंद्र माना जाता था. यहीं से पशुपालन, कृषि और आपसी सहयोग की परंपरा मजबूत होती थी. ग्राम प्रधान सुमन बेंग बताते हैं कि गौ बथान परंपरा की फिलहाल चरकाटोली गांव में बचा है. बाकी गांवों में यह परंपरा लुप्त हो गयी. जिस गांव का गौ बथान आबाद रहता था. वहां आपसी भाईचारा, सामूहिकता व सामाजिक समरसता भी उतनी ही मजबूत होती थी.

गौ चरवाहा था गांव के विश्वास का प्रतीक

ग्रामीण जीवन में गौ चरवाहा केवल पशुओं को चराने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे गांव के विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक होता था. वह सुबह हर घर से गाय-बैल लेकर जंगल या चारागाह ले जाता और शाम को सभी मवेशियों को सुरक्षित वापस लौटाता. उसकी सेवा के सम्मान में प्रत्येक परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार धान, चावल, दाल, सब्जियां और अन्य आवश्यक सामग्री देता था. यह केवल मेहनताना नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और सामाजिक साझेदारी का प्रतीक था.

दीपावली पर चरवाहों को मिलता था विशेष सम्मान

दीपावली का पर्व गौ चरवाहों के लिए विशेष महत्व रखता था. इस अवसर पर गांव के प्रत्येक परिवार की ओर से उन्हें नये कपड़े, धोती, गमछा, कुर्ता तथा चावल, दाल, गुड़, मिठाई और त्योहार के विशेष पकवान भेंट किये जाते थे. यह परंपरा पूरे वर्ष गांव के पशुधन की सेवा करने वाले चरवाहे के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का माध्यम था.

गांव की खुली चौपाल हुआ करता था गौ बथान

गौ बथान गांव की खुली चौपाल भी हुआ करता था. जहां बह-शाम ग्रामीण एकत्र होकर खेती-किसानी, मौसम, फसल और गांव के विकास जैसे विषयों पर चर्चा करते थे. बच्चों को पशुओं के प्रति संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और सामूहिक जीवन के संस्कार भी यहीं मिलते थे.

आधुनिक मशीनों ने घटाई बैलों की उपयोगिता

लेकिन समय के साथ खेती में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों का उपयोग बढ़ने के कारण बैलों की उपयोगिता घट गयी और चारागाह सिकुड़ते गये. संयुक्त परिवार बिखरने लगे और युवाओं का रुझान शहरों की ओर बढ़ गया. परिणामस्वरूप पशुपालन कम होता गया और गौ बथानों का महत्व भी घटता चला गया.

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गौ बथान के साथ विलुप्त हो रही लोक परंपराएं

उन्होंने आगे कहा कि गौ बथानों के समाप्त होने से दीपावली पर चरवाहों का सम्मान, सामूहिक गौ पूजा, गोबर से बथान सजाने और पूरे गांव के साथ मिलकर त्योहार मनाने जैसी परंपराएं भी तेजी से विलुप्त हो रही है. नई पीढ़ी इन लोक परंपराओं से अनजान होती जा रही है. जिससे गांवों की सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ रही है.

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लेखक के बारे में

By अपूर्व कुमार शुक्ला

अपूर्व कुमार शुक्ला युवा पत्रकार हैं. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स और नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय,पलामू से बैचलर इन बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की है. पत्रकारिता से पहले वे करीब एक दशक तक सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी से जुड़े रहे, इस दौरान भारतीय और विशेष रूप से झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और नीतिगत विषयों का गहन अध्ययन किया. पत्रकारिता की शुरुआत खबर मंत्र संस्थान में रिपोर्टर के रूप में की, जहां झारखंड के प्रमुख नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट के साक्षात्कार किए. वर्तमान में प्रभात खबर में खबर लेखन और संपादन से जुड़े हैं. उनकी पत्रकारिता जनसरोकार, तथ्यपरकता और मुद्दों की गहराई पर केंद्रित है.

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