प्रेम प्रकाश भगत की रिपोर्ट
डुमरी (गुमला): कभी गांवों की सुबह गो बथान से शुरू होती थी. सूरज की पहली किरण के साथ गायों की घंटियों की आवाज, चरवाहों की पुकार और ग्रामीणों की चहल-पहल से गांव जीवंत हो उठता था. आज वही गो बथान वीरान पड़े हैं. कई जगह झाड़ियां उग आई हैं और इनके साथ ग्रामीण समाज की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी परंपराएं भी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं.
गो बथान सिर्फ मवेशियों को रखने की जगह नहीं था, बल्कि गांव की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का अहम केंद्र हुआ करता था. यहीं से पशुपालन, खेती और आपसी सहयोग की परंपरा मजबूत होती थी. ग्राम प्रधान सुमन बेंग बताते हैं कि चरकाटोली गांव में आज भी गो बथान की परंपरा किसी हद तक कायम है, जबकि दूसरे गांवों में यह लगभग खत्म हो चुकी है. उनका कहना है कि जिस गांव का गो बथान आबाद रहता था, वहां भाईचारा, सामूहिकता और सामाजिक समरसता भी उतनी ही मजबूत होती थी.
गांव के जीवन का अहम हिस्सा था गो चरवाहा
गो चरवाहा ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था. वह सुबह हर घर से गाय-बैल लेकर जंगल या चारागाह जाता और शाम को सभी पशुओं को सुरक्षित वापस पहुंचाता था. उसकी सेवा के बदले ग्रामीण परिवार अपनी क्षमता के अनुसार धान, चावल, दाल, सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्री देते थे. यह सिर्फ मेहनताने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि आपसी विश्वास, सम्मान और सामाजिक साझेदारी का प्रतीक थी.
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दीपावली पर होता था चरवाहों का विशेष सम्मान
दीपावली के अवसर पर चरवाहों का विशेष सम्मान किया जाता था. गांव के परिवार उन्हें नये कपड़े, धोती, गमछा और कुर्ता देने के साथ चावल, दाल, गुड़, मिठाई और पकवान भेंट करते थे. गो बथान में सामूहिक गो पूजा और गोबर से सजावट भी पर्व का अहम हिस्सा हुआ करती थी. गो बथान गांव की खुली चौपाल के रूप में भी काम करता था. यहां ग्रामीण खेती-किसानी, मौसम, फसल और गांव के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते थे. बच्चों को पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और सामूहिक जीवन के संस्कार भी इसी माहौल में मिलते थे. इस तरह गो बथान गांव के सामाजिक जीवन को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी था.
आधुनिकता के साथ खत्म होती गयी परंपरा
समय के साथ ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल से बैलों की उपयोगिता कम हो गई. चारागाह सिकुड़ते गये, संयुक्त परिवार बिखरने लगे और युवाओं का पलायन बढ़ा. इन बदलावों का सीधा असर पशुपालन पर पड़ा और धीरे-धीरे गो बथान भी उजड़ते चले गए. इसके साथ चरवाहों के सम्मान, सामूहिक गो पूजा और मिल-जुलकर त्योहार मनाने जैसी परंपराएं भी खत्म होने लगीं. नयी पीढ़ी इन लोक परंपराओं से दूर होती जा रही है. इससे गांवों की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ रहा है.
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