जगरनाथ पासवान
Gumla: गुमला में रामनवमी पर्व का इतिहास अनोखा है. कुछ यादगार पल भी जुड़ा है. गौ मेला से रामनवमी जुलूस शुरू हुई थी. यह परंपरा आज भी जीवित है. हम रामनवमी पर्व पर उन अखाड़ों के इतिहास के बारे में जानेंगे जिसने आज से वर्षों पूर्व अखाड़ा पूजा की शुरूआत कर रामनवमी पर्व की मजबूत नींव की स्थापना की थी. आज हम बात करेंगे, गुमला शहर के पवनपुत्र संघ बड़ाइक मुहल्ला के अखाड़ा की. इस अखाड़ा की नींव 1967 ईस्वी में रखी गयी थी. 58 साल पहले जिस अखाड़ा का बीज बोया गया था. आज वह विशाल रूप ले चुका है. 1967 ईस्वी में बनवारी साव, भोला साव, मदन साव, श्याम सुंदर प्रसाद (अब सभी दिवंगत) ने पवनपुत्र संघ की नींव रखी और श्री बड़ा दुर्गा मंदिर के सामने स्थित हनुमान मंदिर के सामने अखाड़ा पूजा की.
उस समय गुमला ज्यादा विकसित नहीं था. गुमला को जिला का भी दर्जा प्राप्त नहीं था. 1967 में गुमला अनुमंडल हुआ करता था. ऐसे समय में पवनपुत्र संघ की नींव रखी गयी. बिजली नहीं थी. इस कारण लोग पेट्रोमेक्स और मशाल जलाकर अखाड़ा सजाते थे. लाठी, तलवार, भाला, बलुवा, गदा का खेल दिखाते थे. अखाड़ा के चारों ओर सात से आठ पेट्रोमेक्स जलते थे.
लोहरदगा और सिमडेगा से आते थे लोग
पवनपुत्र संघ द्वारा अस्त्र शास्त्र परिचालन प्रतियोगिता का आयोजन कराया जाता था. उस समय लोहरदगा और सिमडेगा के लोग भी गुमला आते थे. बगल राज्य छत्तीसगढ़ के जशपुर जिला के लोग भी पवनपुत्र संघ के आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते थे. स्व भददे सिंह अच्छे खिलाड़ी थे. पवनपुत्र संघ ने प्रतियोगिता आयोजित कर पुरस्कार में चांदी का शिल्ड देने की परंपरा शुरू की थी. प्रतियोगिता कराने में गोपाल गोप, गनसा मिस्त्री, उदय सिंह, सदन प्रसाद साव का महत्वपूर्ण योगदान रहता था. अब वर्तमान पीढ़ी कई वर्षो से पवनपुत्र संघ का संचालन कर रही है. संघ द्वारा आकर्षक झांकी भी निकालने की परंपरा शुरू की गयी थी. रामनवमी जुलूस में संघ द्वारा भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान या फिर देशभक्ति व धार्मिक झांकी निकाली जाती रही है.
पहाड़ के ऊपर सजता था अखाड़ा
जिस स्थान पर अभी हनुमान मंदिर है. वह मंदिर पहाड़ के ऊपर बनी है. मंदिर के चारों ओर पहाड़ था. लोग पहाड़ पर मिटटी, बालू व मोरम डालकर पहाड़ में अखाड़ा बनाते थे. जिससे लोग करतब व खेल के दौरान गिरकर चोटिल न हो सके. हालांकि बदलते समय के साथ पहाड़ खत्म हो गया. अब पहाड़ के ऊपर नगर परिषद गुमला ने डेली मार्केट बना दिया है. मंदिर के सामने कुछ हिस्सा है. पहाड़ को समतल कर दिया गया है. ऐसे, डेली मार्केट के कारण अखाड़ा अब छोटा हो गया. इसके बाद भी यहां पूरे उत्साह के साथ पूजा होती है.
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