आम के झड़ रहे हैं टिकोले तो सतर्क हो जाएं किसान, बचाने के लिए ये हैं उपाय

Mango Fruit: आम के टिकोलों के झड़ने से परेशान किसानों के लिए जरूरी उपाय जानिए. बेमौसम बारिश, तेज हवा और रोगों से बचाव के लिए सिंचाई प्रबंधन, प्लेनोफिक्स दवा, उर्वरक और फफूंदनाशक के सही उपयोग से पैदावार बढ़ाने के आसान और प्रभावी तरीके यहां पढ़ें. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

गुमला से दुर्जय पासवान की रिपोर्ट

Mango Fruit: आम को फलों का राजा कहा जाता है. लेकिन, इसके उत्पादन में सबसे बड़ी चुनौती टिकोलों (छोटे फलों) का झड़ना है. झारखंड में अभी बेमौसम बारिश हो रही है. तेज हवाएं चल रही हैं. इससे आम के टिकोले झड़ रहे हैं. यह प्रकृति की मार है. इसके अलावा, आम के पेड़ों पर विभिन्न प्रकार के कीड़े और रोगों का आक्रमण भी बढ़ जाता है, जिससे फलों को काफी नुकसान होता है. यदि किसान समय रहते उचित इंतजाम नहीं करते हैं, तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.

क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, टिकोलों को सुरक्षित रखने के लिए बागों की विशेष देखभाल करना बहुत जरूरी है. सबसे पहले सिंचाई प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है. इस समय आम के पेड़ों को हल्की सिंचाई की जरूरत होती है, ताकि मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और पौधों को पोषण मिलता रहे. यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि पेड़ों के आसपास पानी का जमाव बिल्कुल न हो. जल जमाव की स्थिति में जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती. इससे पेड़ की जड़ों में सड़न की समस्या पैदा हो सकती है और फलों के झड़ने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था करना बहुत जरूरी है.

प्लेनोफिक्स दवा का उपयोग करे किसान

टिकोलों के झड़ने की समस्या से बचने के लिए वैज्ञानिकों ने कीटनाशक के छिड़काव की सलाह दी है. जिन बागों में सीजन की शुरुआत में ही टिकोलों का झड़ना शुरू हो गया है, वहां किसान प्लेनोफिक्स दवा का इस्तेमाल कर सकते हैं. एक एमएल प्लेनोफिक्स को तीन लीटर पानी में घोलकर पेड़ों पर छिड़काव करने से फल झड़ने की समस्या में काफी कमी आती है. यह दवा पौधों के हार्मोन संतुलन को बनाए रखने में सहायक होती है. इससे फल पेड़ों पर मजबूती से टिके रहते हैं. छिड़काव सुबह या शाम के समय करना अधिक प्रभावी होता है.

आम के फल ऐसे ज्यादा होंगे

जिन बागों में इस साल फल नहीं हुआ है. वहां के किसान बाग प्रबंधन कार्यों पर ध्यान दे सकते हैं. ऐसे पेड़ों को पोषण देना बहुत जरूरी है, ताकि अगले साल अच्छी फल प्राप्त हो सके. इसके लिए 10 साल या उससे अधिक उम्र के पेड़ों की जड़ों से लगभग दो मीटर दूरी पर गोलाकार नाली बनाकर उसमें संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए. इसमें 500 ग्राम यूरिया, 500 ग्राम डीएपी, 850 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और करीब 25 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिलाकर डालना चाहिए. इसके बाद हल्की सिंचाई करने से उर्वरक मिट्टी में अच्छी तरह घुलकर जड़ों तक पहुंच जाते हैं और पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है.

आम के पेड़ों में रोग प्रबंधन जरूरी

कृषि वैज्ञानिक अटल बिहारी तिवारी ने कहा है कि रोग प्रबंधन इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण है. आम के बागों में मधुवा (पाउडरी मिल्ड्यू) और चूर्णिल आसिता जैसे रोग तेजी से फैलते हैं. इन रोगों के कारण फूल एवं छोटे फल प्रभावित होते हैं और उत्पादन में भारी कमी आ जाती है. इन रोगों के नियंत्रण के लिए किसान हेक्साकोनाजोल का 1/8 एमएल प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त कार्बेन्डाजिम का एक एमएल प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से भी रोग नियंत्रण में मदद मिलती है. समय पर और सही मात्रा में दवाओं का उपयोग करने से रोगों की तीव्रता को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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अच्छी पैदावार के लिए प्रबंधन जरूरी

वे कहते हैं कि किसानों को यह समझना होगा कि आम की अच्छी पैदावार के लिए समग्र प्रबंधन आवश्यक है. केवल उर्वरक या दवा का उपयोग ही पर्याप्त नहीं है. बल्कि सिंचाई, पोषण, रोग एवं कीट नियंत्रण सभी पहलुओं पर संतुलित ध्यान देना जरूरी है. नियमित निगरानी और समय पर कार्यवाही से टिकोलों के झड़ने की समस्या को रोका जा सकता है और बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

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लेखक के बारे में

Published by: KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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