गुमला: मंगलवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष करमा पर्व यानी कर्मा एकादशी मनायी जायेगी. यह पर्व झारखंड की लोक-संस्कृति में प्रकृति, कर्म और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि कर्तव्यों को निष्ठा से निभाना ईश्वर की सच्ची आराधना और जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता वास्तविक पूजा है.
गुमला चेटर शिव मंदिर के पुजारी विकास मिश्र उर्फ बबलू ने बताया कि करमा पूजा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है. अच्छी फसल, वर्षा, पारिवारिक खुशहाली और भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती के लिए यह पूजा की जाती है. शास्त्रों के अनुसार धर्म के दायरे में रहकर किया गया कर्म ही श्रेष्ठ माना गया है. धर्म मनुष्य को अच्छे-बुरे कर्मों में अंतर करना सिखाता है.
करम डाली की पूजा कर मांगी जाती है खुशहाली : कर्मा एकादशी का पर्व मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में मनाया जाता है. इस दिन बहनें भाइयों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से व्रत रखती हैं. करम डाली की विधि-विधान से पूजा के बाद रातभर भजन-कीर्तन और लोकगीत होते हैं.
द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद कर्मी साग, बासी भात और दही खाकर व्रत का पारण किया जाता है. सनातन धर्म में करमा को पारंपरिक धार्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक कर्मा एकादशी व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है तथा संतान सुख, धन-धान्य और अखंड सौभाग्य मिलता है. करम वृक्ष की पूजा मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीक है. पर्व अच्छे कर्म करने और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है.
