दुर्जय पासवान
गुमला : प्राचार्य डॉ शशिभूषण की हत्या का आरोपी कृष्णा उरांव शातिर है. उसके पिता पाही उरांव व मां देवमइत देवी जिंदा हैं. दोनों हुरहुरिया गांव में रहते हैं. लेकिन कृष्णा ने अपने माता-पिता को मृत बताते हुए अपने को अनाथ बता रहा है. पुलिस को दिये बयान में कृष्णा ने कहा : मैं अनाथ हूं.
मेरे माता-पिता मर चुके हैं. मजदूरी कर पढ़ाई कर रहा हूं. उसने अपना नाम भी बदल दिया. अपना नाम राकेश कुजूर बता रहा है. पिता स्व अनिल कुजूर. उसने कॉलेज का फरजी आइ कार्ड भी बनाया है. उसमें भी राकेश कुजूर नाम लिखा है. इसलिए पुलिस भ्रमित हो गयी और राकेश कुजूर के नाम से एफआइआर दर्ज किया. इस मामले की तहकीकात प्रभात खबर ने शहर से 20 किमी दूर हुरहुरिया गांव जाकर की. गांव में परिजन व ग्रामीणों से पूछताछ में पता चला कि वास्तव में अपने को राकेश बतानेवाला शातिर हत्यारा का नाम कृष्णा उरांव है.
जिंदा रहते बेटे ने हमें मार दिया आरोपी कृष्णा के पिता पाही उरांव ने कहा : मैं और मेरी पत्नी जिंदा हैं. अगर मेरे बेटे ने हमें मृत बताया है, तो वह झूठ बोल रहा है. विश्वास नहीं था कि कृष्णा ऐसा करेगा. हम पति-पत्नी अनपढ़ हैं. लेकिन अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं. ताकि वे होशियार बने. नौकरी करे. जिससे घर की स्थिति सुधरे. लेकिन उसने तो मेरे सपने को तोड़ दिया. जेल गया है, तो जाने दें. मैं उसे छुड़ाने के लिए केस नहीं लड़ूंगा.
खाने के लिए पैसा नहीं है, तो हम कैसे केस लड़ेंगे. पाही ने कहा : जब मैं छह साल का था, उस समय मेरे पिता बुधवा उरांव का निधन हो गया. मैं दूसरे लोगों के घर में धांगर का काम किया. लेकिन कभी गलत रास्ता नहीं अपनाया. अनपढ़ रहा. लेकिन सबकुछ खत्म हो गया. उसकी गलती की सजा उसे जरूर मिले. मां देवमइत देवी ने कहा : जिंदा रहते बेटे ने हमें मार दिया. हम उसे देखने तक नहीं जायेंगे. कृष्णा ने हत्या की. इसकी जानकारी बुधवार को ही मिली थी. फिर भी हम कृष्णा से मिलने नहीं गये.कृष्णा हड़िया-दारू नहीं पीता थाग्रामीणों ने कहा : कृष्णा पढ़ने में अच्छा लड़का था. हड़िया दारू व नशा से दूर था. लेकिन ऐसी हरकत कर देगा, कोई नहीं जाना था. बुधवार को वह गांव में ही था. सुबह को गांव में कुछ हथियारबंद उग्रवादी आये थे. कृष्णा को उन लोगों के साथ देखा गया था. इसके बाद वह गुमला चला गया.
शाम को पता चला कि उसने अपने ही प्राचार्य की हत्या कर दी. उसकी गलती की सजा उसे मिले.कृष्णा के भाई का भी पता नहीं हैकृष्णा के बड़े भाई का नाम रमेश उरांव उर्फ थापा है. उसका भी कहीं पता नहीं है. वह भी केओ कॉलेज में ही पढ़ता था. लेकिन कॉलेज से निकलने के बाद वह कहां गया. किसी को पता नहीं. पिता पाही ने बताया कि महीने दो महीने में घर आता है. पर एक दिन रुकता है, फिर भाग जाता है.
छोटी बहन शनियारो कुमारी है. घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वह पांच साल पहले दिल्ली चली गयी. वहीं किसी घर में काम करती है. साल दो साल में घर आती है. छोटी बहन किरण कुमारी गुमला के एक स्कूल में इंटर व प्रमिला कुमारी गांव के ही गढ़टोली स्कूल में पढ़ती है.दो दिन पहले ही 800 रुपये लियामां देवमइत देवी ने बताया कि कृष्णा एक सप्ताह से घर में ही रह रहा था. गुमला से आना-जाना कर रहा था. दो दिन पहले उसने नामांकन कराने के लिए 800 रुपये लिया था. बहन का भी नामांकन कराने के लिए सात हजार रुपये लिया था. पैसा का उसने क्या किया, इसका पता नहीं है. कृष्णा के हॉस्टल में रहने के लिए गांव से ही चावल दाल भी परिजन भेजते थे.
