Tiger death : भारत अगले महीने की एक से दो तारीख तक (एक-दो जून, 2026) नयी दिल्ली में पहले अंतरराष्ट्रीय बिग कैट अलायंस (आइबीसीए) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. इस सम्मेलन का उद्देश्य शेर, बाघ, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा जैसे सात बिग कैट का संरक्षण है. इस सम्मेलन के जरिये जिन सात बिग कैटों के संरक्षण के प्रयास किये जा रहे हैं, उनमें से एक बाघ, इन दिनों संकट के दौर से गुजर रहा है. इस वर्ष जनवरी से अब तक देश में 58 बाघों की मौत हो चुकी है. इनमें से 26 ने टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बाहर अपनी जान गंवायी है. इनके कारणों में अवैध शिकार, बीमारी, संक्रमण, जंगल छोटे पड़ने, अस्तित्व की लड़ाई, शिकार और पानी की तलाश में जंगल से बाहर जाने और मानव से हो रहे संघर्ष शामिल हैं.
गौरतलब है कि एक समय विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हमारे इस राष्ट्रीय पशु की संख्या ‘बाघ संरक्षण परियोजना’ के चलते बढ़ी और आज देश में इसकी संख्या दुनिया की 75 प्रतिशत से अधिक हो गयी है. एक अनुमान के अनुसार, 1950 के दशक में देश में बाघों की तादाद 40,000 तक थी, लेकिन उसी दौर में इनके लगातार शिकार और आवास के खात्मे के चलते इनकी तादाद में तेजी से कमी आनी शुरू हो गयी. वर्ष 1972 की गणना की बात करें, तो देश में इनकी तादाद कम होकर 1,827 पर पहुंच गयी थी. वर्ष 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत के बाद इनकी तादाद में वृद्धि होनी शुरू हुई और लगभग चार दशक के बाद इनकी तादाद 3,682 तक जा पहुंची.
वह बात दीगर है कि इस दौरान बीच-बीच में इनके गायब होने के समाचार भी सुर्खियां बनते रहे. इनमें यौनवर्धक दवाओं की खातिर इनके अंगों और खालों की तस्करी के चलते इनके शिकार के मामले आम रहे हैं. आज जबकि देश में बाघों का कुनबा 3,000 का आंकड़ा पार कर चुका है, फिर भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन्हें बचाया कैसे जाये. क्योंकि अब इनकी तादाद में दिनों-दिन कमी आती जा रही है. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार, 2026 के जनवरी से मार्च तक देश में कुल 46 बाघों की मौत हुई है, जिनमें 18 की मौत तो अकेले मध्य प्रदेश में ही हुई है, जो इस राज्य के टाइगर स्टेट के रुतबे पर ही सवाल खड़े करता है.
मध्य प्रदेश के ही ‘कान्हा टाइगर रिजर्व’ मे बीते महीने एक बाघिन व उसके चार शावकों की मौत से वन्य प्राणी विशेषज्ञ हैरत में हैं. इस बारे में कान्हा बाघ प्रबंधन की मानें, तो टी-141 नामक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत फेफड़ों के संक्रमण के चलते हुई है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ है. सूत्रों की मानें, तो 21 अप्रैल को यह बाघिन अपने चार शावकों के साथ सरही जोन में दिखी थी. वह काफी कमजोर लग रही थी और ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. उसके बाद एक के बाद एक, एक वर्ष की उम्र के कुल चार शावकों सहित बाघिन की मौत ने प्रबंधन की चिंता बढ़ा दी कि आखिर संक्रमण आया कहां से.
बाघों की मौत का मामला केवल इसी वर्ष का नहीं है, 2025 में देश में लगभग 166-167 से अधिक बाघों की मौत हुई थी. यदि 2020 से 2025 के बीच का जायजा लें, तो इस दौरान देश में 628-632 से अधिक बाघों की मौत हुई है. कुछ रिपोर्टें और वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़ा 800 से अधिक है. ये आंकड़े बाघ संरक्षण के सरकारी दावों पर सवालिया निशान लगाते हैं. बीते पांच सालों में सबसे अधिक (224 से अधिक) बाघों की मौत मध्य प्रदेश में हुई है. यहां अकेले 2025 में ही 55 बाघों की मौत हो गयी. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की मानें, तो बीते पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा चौंकाने वाला है. इस राज्य में 2021 में 34, 2022 में 43, 2023 में 45 और 2024 में 46 बाघों की मौत हो गयी. बाघों की मौत के मामले में जहां मध्य प्रदेश शीर्ष पर है, वहीं महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है. मध्य प्रदेश बाघों की संख्या के मामले में भी शीर्ष पर है. यहां 785 बाघ हैं, जबकि कर्नाटक में 563, उत्तराखंड में 560, महाराष्ट्र में 444 और तमिलनाडु में 306 हैं. शेष देश के दूसरे राज्यों में हैं.
यह सच है कि भारत के बाघ संरक्षण अभियान की समूची दुनिया में धाक है.
पिछले दशकों में बढ़ी बाघों की तादाद इसका जीता-जागता सबूत है, लेकिन मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ते जाना बाघों की निगरानी और सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े करता है. इस वर्ष के शुरुआती तीन महीनों में मध्य प्रदेश में हुई 18 बाघों की मौत का आंकड़ा बाघों की कुल आबादी का लगभग 2.30 फीसदी है. इस दौरान देशभर में 46 बाघों की मौत हुई, जो कुल आबादी का 7.29 फीसदी है. बाघों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश के हालात बेहद गंभीर हैं. इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में बाघों के शव एक सप्ताह या उससे भी ज्यादा समय बाद मिल रहे हैं. इस बाबत मुख्य वन संरक्षक स्वीकारते हैं कि बाघों की मौतों का यह आंकड़ा चुनौतीपूर्ण है. वे इनकी नये सिरे से जांच की बात भी करते हैं. पर इस मामले में सरकार का मौन समझ से परे है. ऐसे हालात में राष्ट्रीय पशु बाघ बचेगा तो कैसे? यही चिंता और विचार का विषय है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
