गुमला : गुमला शहर से चार किलोमीटर दूर देवनगर में सांसारिक कुड़ुख स्कूल की स्थापना कर सुशील उरांव 130 गरीब व अनाथ बच्चों का भविष्य संवारने में लगे हुए हैं. यहां 30 अनाथ और 100 गरीब बच्चे हैं. झारखंड के अलावा इसमें दूसरे राज्यों के भी बच्चे हैं. सुशील उरांव ने गरीब व अनाथ बच्चों का भविष्य सुधारने के उद्देश्य से दो फरवरी 2004 में स्कूल की स्थापना की थी.
शुरूआती समय में स्कूल में 10 बच्चे थे. आज 130 बच्चे हैं. 2.75 एकड़ डिसमिल जमीन पर स्कूल है. जिसमें बच्चों को पठन-पाठन और रहने के लिए 17 कमरा बनाया गया है. सभी कमरों का दीवार कच्ची मिट्टी और छत एस्बेस्टस व घास-फुस का है. इसी में बच्चे रहते हैं और पढ़ाई भी करते हैं.
सुशील कहते हैं कि पांच अन्य युवक बलकू तिर्की, अजरुन यादव, महावीर उरांव, एतवा उरांव व साखी उरांव बच्चों का भविष्य संवारने में सहयोग कर रहे हैं. ये लोग मानदेय भी नहीं लेते हैं. ये कहते हैं कि बच्चों को पढ़ाने में अच्छा लगता है.
खेतीबारी से होती है खर्च की जुगाड़ : स्कूल में बच्चों की पढ़ाई, खाने-पीने और कपड़ा के अलावा अन्य खर्च का जुगाड़ खेतीबारी से पूरा किया जाता है. सुशील ने 30 एकड़ खेत अधबंटाई में लिया है. इसमें वह हर साल खेती करता है. अभी उक्त भूमि पर गन्ना व धान की खेती की गयी है. इसके अलावा मटर, बैगन व साग भी लगाया गया है. सुशील ने बताया कि खेत में तैयार फसल को बाजार में बेचते हैं. इससे जो आमदनी होती है, उसी से स्कूल चलता है.
सुशील सर ही हमारे सब कुछ हैं : बच्चे : स्कूल में झारखंड राज्य के अलावा आसाम, बंगाल, बिहार सहित अन्य राज्यों के अनाथ बच्चे हैं. अजीत उरांव, अजीत कुमार, रोहित उरांव, दी पॉल, अगस्तु चीक बड़ाइक, ममता कुमारी, जारूस, सुगंती कुमारी, उमेश्वर उरांव, उपेश उरांव, सुरेश उरांव, संदीप झरिया, श्याम, पंकज आदि बच्चे कहते हैं कि सुशील सर ही हमारा सब कुछ हैं. वे ही हमें पढ़ा-लिखा कर योग्य इंसान बना रहे हैं.
सरकारी सहयोग नहीं : सुशील : सुशील उरांव स्नातक पास हैं. पत्नी का नाम सीमा उरांव है. तीन बच्चे हैं. जिनका नाम प्रमाणित उरांव, शैलपुत्री व भगवती है. ये लोग भी उसी स्कूल में पढ़ते हैं. सुशील कहते हैं कि अभी तक स्कूल चलाने के लिए किसी प्रकार का सरकार सहयोग नहीं मिला है. यदि सरकारी सहयोग मिलेगा, तो यहां के गरीब व अनाथ बच्चों का भविष्य संवारने में मदद होगी.
