गांवों में पर्याप्त रोजगार और आय के साधन नहीं मिलने का असर अब उन परिवारों पर भी दिख रहा है, जिनके सदस्य रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं. परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने के लिए घर छोड़ने वाले प्रवासी मजदूरों को दूसरे शहरों में रोजगार के साथ बीमारी, असुरक्षा और परिवार से दूर रहने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गांडेय प्रखंड में पिछले एक सप्ताह के दौरान अलग-अलग राज्यों में तीन प्रवासी मजदूरों की मौत ने पलायन की इस पीड़ा को सामने ला दिया है. तीनों परिवारों के सामने अब कमाने वाले सदस्य को खोने के बाद आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का संकट खड़ा हो गया है.
12 वर्षों से दिल्ली में मजदूरी कर रहा था अब्बास
अहिल्यापुर थाना क्षेत्र के गजकुंडा पंचायत अंतर्गत पहरीडीह निवासी 38 वर्षीय अब्बास अंसारी करीब 12 वर्षों से दिल्ली के वसंत कुंज स्थित रंगपुरी पहाड़ी इलाके में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण कर रहा था. परिजनों के अनुसार, दो सितंबर को अचानक सीने में तेज दर्द होने के बाद उसे एम्स ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया.
पोस्टमार्टम और अन्य कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद एंबुलेंस से शव गांव लाया गया. अब्बास अपने पीछे पत्नी, दो बेटे और दो बेटियां छोड़ गया है. लंबे समय से परिवार की आय का प्रमुख सहारा रहे अब्बास की मौत के बाद परिजनों के सामने आर्थिक जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं.
पति से अलगाव के बाद बेटे के साथ सूरत गयी थी लक्ष्मी
मोहदा मोड़ स्थित हरिजन टोला निवासी बसंत तुरी की बेटी लक्ष्मी देवी (28) की सूरत में इलाज के दौरान मौत हो गयी. परिजनों के अनुसार, लक्ष्मी पिछले कुछ समय से बीमार थी और सूरत के एक अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था.
करीब 11 वर्ष पहले उसकी शादी धनबाद के जामाडोभा निवासी युवक से हुई थी. उसका एक बेटा भी है. परिजनों के अनुसार, करीब चार वर्ष पहले पति से अलगाव के बाद वह अपने बेटे को लेकर रोजगार की तलाश में सूरत चली गयी थी. पिछले तीन वर्षों से वह अपनी छोटी बहन और परिचितों के साथ वहां रह रही थी. उसकी मौत के बाद परिवार के सामने बेटे की देखभाल और भविष्य की जिम्मेदारी का सवाल खड़ा हो गया है.
केरल में मजदूरी शुरू करने के कुछ दिन बाद देवनारायण की मौत
गांडेय थाना क्षेत्र के बरमसिया वन निवासी देवनारायण उर्फ दारो ठाकुर (48) करीब दस दिन पहले मजदूरी करने के लिए केरल गया था. परिजनों के अनुसार, वहां उसने एक दिन काम किया. इसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ गयी और हृदय गति रुकने से उसकी मौत हो गयी.
पोस्टमार्टम समेत अन्य प्रक्रिया पूरी होने के बाद सोमवार को उसका शव गांव पहुंचा. देवनारायण अपने पीछे पत्नी, पांच बेटियां और एक बेटा छोड़ गया है. परिवार के लिए उसकी मौत के बाद आय के साधन और बच्चों की जिम्मेदारी बड़ी चुनौती बन गयी है.
रोजगार की तलाश में पलायन, पीछे छूट जाता है परिवार
गांडेय में एक सप्ताह के भीतर सामने आयीं इन तीन घटनाओं ने गांवों में रोजगार के अवसर और उससे जुड़े पलायन के सवाल को फिर सामने ला दिया है. रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने वाले मजदूरों के लिए रोजगार के साथ स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सहारे की चुनौती भी बनी रहती है.
दूसरे राज्यों में बीमारी या मौत की स्थिति में परिवार को आर्थिक नुकसान के साथ शव को घर लाने, अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने और आगे की जिंदगी चलाने जैसी अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर और प्रवासी मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
