Giridih News : राकेश सिन्हा, गिरिडीह. जिले के जिन इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती थी और जहां पुलिस पहुंचने के लिए कई बार सोचती थी, वहां से नक्सलियों का अब लगभग सफाया हो गया है. झारखंड गठन के बाद लगभग दो दशक तक जिले के 13 प्रखंडों में से लगभग दस प्रखंडों में नक्सलियों की तूती बोलती थी. लेकिन, पिछले डेढ़ दशक में सरकार की रणनीति ने न सिर्फ नक्सलियों की कमर तोड़ दी. बल्कि इलाके का पूरा सामाजिक ताना-बाना ही बदल दिया. सरकार की विकास नीति, प्रत्यार्पण नीति और सामुदायिक पुलिसिंग के साथ बनायी गयी. साथ ठोस रणनीति ने नक्सल क्षेत्र की तस्वीर ही बदलकर रख दी है. अब इन इलाकों में सरकार की विकास की योजनाएं न सिर्फ धरातल पर उतर रही है, बल्कि इसका पूरा लाभ ग्रामीण बेखौफ उठा भी रहे हैं.
पारसनाथ की तलहटी में गूंजती थी बंदूक की गोलियां :
आज से डेढ़ दशक पूर्व तक गिरिडीह जिले के पीरटांड़ क्षेत्र में स्थित पारसनाथ पर्वत की तराई वाले इलाके को नक्सलियों के सेफ जोन के रूप में जाना जाता था. इस इलाके में नक्सलियों का कई ट्रेनिंग कैंप हुआ करता था जहां झारखंड, बिहार, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के नक्सली ट्रेनिंग लेने के लिए पहुंचते थे. यहां माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर में शामिल होने वाले नये लोगों को गुरिला युद्ध समेत लड़ाई के अन्य तरीके और बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी. इतना ही नहीं, इस इलाके में जंगल और पहाड़ों के बीच नक्सलियों ने कई बंकर भी बना रखा था जहां नक्सली शरण लेते थे और लूटे गये हथियार आदि छिपाकर रखते थे. परंतु वर्ष 2009 के बाद इन इलाकों में पुलिस ने नक्सलियों के उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाया. इस दौरान कई नक्सली मारे गये और उनके ट्रेनिंग कैंप और बंकर को भी ध्वस्त कर दिया गया.पांच दर्जन से भी ज्यादा नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण :
नक्सली उन्मूलन के दौरान पुलिस ने वर्ष 2014 के बाद विकास के साथ-साथ सामुदायिक पुलिसिंग के जरिये सरकार की बातों को ग्रामीणों तक पहुंचाने में सफल हुई. स्थिति यह हुआ कि कई नक्सलियों ने या तो सरकार के भय से या सरकर की नीति का लाभ लेने के उद्देश्य से आत्मसमर्पण कर दिया. वैसे तो झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के प्रयास से वर्ष 2001 में ही लगभग तीन दर्जन नक्सलियों ने समर्पण किया था. लेकिन, वर्ष 2014 के बाद कई हार्डकोर और खूंखार नक्सलियों ने समर्पण कर देना उचित समझा. नुनूचंद, बिरबल, बच्चन और सुनील सोरेन के आत्मसमर्पण से संगठन को करारा झटका लगा. स्थिति ऐसी बदली कि नक्सल इलाके में जो ग्रामीण नक्सलियों के मुखबिर बने हुए थे, वे पुलिस के मुखबिर बन गये. इससे पुलिस अभियान को काफी हद तक मदद मिली. गिरिडीह जिले के पीरटांड़ इलाके का रहने वाला एक करोड़ का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा के साथ-साथ 25 लाख का इनामी नक्सली अजय महतो को भी सरेंडर कराने के लिए उसके करीबी लोगों से संपर्क किया जा रहा है.अब अधिकांश गांवों में दिखती है विकास की तस्वीर :
जिस इलाके में पुलिस के साथ-साथ सरकारी कर्मी भी जाने से घबराते थे, उन इलाकों में अब विकास की हरियाली नजर आने लगी है. नक्सल क्षेत्र के अधिकांश गांव सड़क से जुड़कर मुख्यधारा से जुड़ गये हैं. वहीं कई सरकारी योजनाएं जैसे चेकडैम, सिंचाई योजना, विद्युतीकरण आदि धरातल पर उतर चुकी है. इससे सरकारी कर्मी गांवों में पहुंचकर बेखौफ सरकार की योजनाओं पर काम कर रहे हैं और पुलिस भी गांवों तक पहुंचकर लोगों को सुरक्षा मुहैया करा रही है. अब गांवों में पुलिस का पहुंचना आसान हो गया है.नक्सलमुक्त हो गया पारसनाथ :
वैसे तो गिरिडीह जिले के लगभग सभी प्रखंड नक्सलमुक्त हो चुके हैं. लेकिन, नक्सलियों के लिए सेफ जोन रहा पारसनाथ पर्वत का इलाका भी अब नक्सलमुक्त हो गया है. जिले के पीरटांड़ प्रखंड के अलावे डुमरी, बगोदर, सरिया, तिसरी, गावां, देवरी, बिरनी, गांडेय और गिरिडीह प्रखंड में अब नक्सलियों की गतिविधियां नहीं है. प्रभावित समय में जिले में सबसे ज्यादा घटनाएं पीरटांड़ के इलाके में हुआ करती थी. लेकिन इन इलाकों में अब नक्सलियों की गतिविधियां लगभग शून्य हो गयी है. स्थिति यह है कि सरकार ने भी गिरिडीह जिले को एसआरई श्रेणी से अलग कर दिया है. इतना ही नहीं, काफी संख्या में केंद्रीय बलों को वापस बुला लिया गया है. इस इलाके में सीआरपीएफ की दो-दो बटालियन सक्रिय थी. इसमें से एक बटालियन को हटा लिया गया. जबकि इसके पूर्व एसएबी को हटा लिया गया था. अब आईआरबी, जैप, जिला पुलिस के अलावा सीआरपीएफ की एक कंपनी इलाके में है.नक्सली गतिविधियां शून्य, फिर भी पुलिस अलर्ट है : एएसपी
गिरिडीह में नक्सल अभियान से जुड़े एएसपी सुरजीत कुमार कहते हैं कि इलाके से नक्सलियों का बिल्कुल सफाया हो चुका है. लेकिन पुलिस अभी भी अलर्ट मोड पर है. उन्होंने कहा कि नक्सल उन्मूलन के लिए सरकार की बेहतर नीति ने नक्सलियों के कमर को तोड़कर रख दिया. एक ओर जहां पुलिस का दबाव बढ़ाया गया, वहीं ग्रामीणों में विकास के जरिये बेहतर संबंध बनाने की कोशिश की गयी. कम्युनिटी पुलिसिंग के साथ-साथ विकास के जरिये गांव के लोगों का विश्वास जीतने में पुलिस सफल रही.
