Giridih news: भेलवाघाटी में 20 साल बाद भी नक्सलियों के खूनी खेल का दहशत कायम

Giridih news: 11 सितंबर की रात भेलवाघाटी के इतिहास में काली रात के रूप में दर्ज है. बताया जाता है की इलाके में नक्सल गतिविधि को पनपते देख नक्सलियों से लोहा लेने के लिए गांव में में ग्राम रक्षा दल का गठन किया गया था. ग्राम रक्षा दल के सदस्यों ने नक्सलियों को गांव में प्रवेश नहीं होने देने का निर्णय लिया था. ग्रामीणों के इस फैसले से सीमाई क्षेत्र में सक्रिय नक्सली नाराज चल रहे थे. नाराज माओवादियों ने 11 सितंबर 2005 की रात को पूरे गांव को घेर लिया और गांव के घरों के सामने की कुंडिया को बंद कर दिया. इसके बाद ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को एक एक कर घर से बाहर निकाला. गांव के बीच चौराहे पर जनअदालत लगायी गयी, माओवादियों की जनअदालत में ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को मौत की सजा सुनाई गयी.

बहुचर्चित भेलवाघाटी नरसंहार के 20 वर्ष बीत जाने के बाद आज इस क्षेत्र में नक्सलियों के पांव उखड़ गए, लेकिन नक्सलियों के खूनी खेल का दहशत कायम है. दहशत की वजह से नरसंहार के बाद इस गांव से पलायन हुए लोग आज भी भेलवाघाटी आने से परहेज कर रहे हैं. मालूम को वर्ष 2005 में 11 सितंबर की भयावह स्याह रात में भाकपा माओवादियों ने गांव के 17 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. 11 सितंबर की रात भेलवाघाटी के इतिहास में काली रात के रूप में दर्ज है. बताया जाता है की इलाके में नक्सल गतिविधि को पनपते देख नक्सलियों से लोहा लेने के लिए गांव में में ग्राम रक्षा दल का गठन किया गया था. ग्राम रक्षा दल के सदस्यों ने नक्सलियों को गांव में प्रवेश नहीं होने देने का निर्णय लिया था. ग्रामीणों के इस फैसले से सीमाई क्षेत्र में सक्रिय नक्सली नाराज चल रहे थे. नाराज माओवादियों ने 11 सितंबर 2005 की रात को पूरे गांव को घेर लिया और गांव के घरों के सामने की कुंडिया को बंद कर दिया. इसके बाद ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को एक एक कर घर से बाहर निकाला. गांव के बीच चौराहे पर जनअदालत लगायी गयी, माओवादियों की जनअदालत में ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को मौत की सजा सुनाई गयी. इसके बाद माओवादियों ने बीच चौराहे पर ही खून की होली खेलकर ग्राम रक्षा दल के सदस्यों की जमकर पिटाई करने के बाद किसी को गोली मारकर तो किसी की गला रेतकर मौत के घाट उतार दिया.

इन 17 लोगों को उतारा गया था मौत के घाट

इस घटना में गांव के मजीद अंसारी, मकसूद अंसारी, मंसूर अंसारी, रज्जाक अंसारी, सिराज अंसारी, रामचंद्र हाजरा, गणेश साव, अशोक हाजरा, जमाल अंसारी, कलीम अंसारी, कलीम अंसारी टू, हमीद मिंया, करीम मियां, चेतन सिंह, दिलमोहम्मद अंसारी, युसूफ अंसारी सहित 17 लोग मारे गए थे. गांव के जिस चौराहे पर नरसंहार को अंजाम दिया गया, वहां खून की धारा बह रही थी. घटना के बाद दर्जनों परिवार गांव से पलायन कर गये, बाद में नक्सलियों का वर्चस्व कम होने के बाद कई परिवार वापस गांव लौट आए, लेकिन कुछ परिवार अब भी गांव में नहीं आना चाह रहे हैं.

विकास का दावा खोखला

इधर घटना में आपने घर के सदस्यों को खोनेवाले परिवारों ने कहा कि बाद में यहां पहुंचे राजनेताओं के द्वारा भेलवाघाटी को आदर्श पंचायत, सभी मृतकों के परिवार को आवास व 2.5-2.5 लाख मुआवजा देने का आश्वसान दिया गया था. लेकिन नौकरी के अलावे मुआवजा राशि में ढाई की जगह एक एक लाख रुपये दिया गया. अधिकांश परिवार को आवास की सुविधा भी नहीं मिल पायी. गांव का विकास नहीं हो पाया.

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Author: MAYANK TIWARI

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