गढ़वाः सरकार ने आम लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला स्तर तक प्रशासनिक व्यवस्था बनाई है. इसका उद्देश्य यही है कि ग्रामीणों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए जिला मुख्यालय का चक्कर नहीं लगाना पड़े. लेकिन गढ़वा में हाल की जनसुनवाई के मामलों पर नजर डालें, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है.
जुलाई से आठ सितंबर तक हुई जनसुनवाई में कई ऐसे मामले सामने आए, जिनका समाधान पंचायत, प्रखंड या संबंधित विभाग के स्थानीय स्तर पर ही हो जाना चाहिए था. इसके बावजूद लोगों को अपनी शिकायत लेकर जिला मुख्यालय पहुंचना पड़ा और उपायुक्त के समक्ष फरियाद करनी पड़ी.
यह स्थिति एक ओर उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा की जनसुनवाई की सक्रियता और उपयोगिता को दिखाती है, तो दूसरी ओर पंचायत और प्रखंड स्तर की शिकायत निवारण व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करती है. राशन, पेंशन, आधार में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजना, गैस कनेक्शन और इलाज जैसी रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी शिकायतों के लिए भी लोगों को डीसी के दरबार तक पहुंचना पड़ रहा है.
राशन-पेंशन के लिए भी जिला मुख्यालय की दौड़
28 जुलाई की जनसुनवाई में भवनाथपुर के बुका निवासी शिवपतिया देवी ने बताया कि उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी, लेकिन पिछले 14 माह से राशि बंद है. उन्होंने प्रखंड विकास पदाधिकारी को आवेदन भी दिया था, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. इसी जनसुनवाई में भवनाथपुर की सरिता देवी ने जनवरी 2025 के बाद मंईयां सम्मान योजना की राशि बंद होने की शिकायत की. संबंधित कार्यालय में दो बार आवेदन देने के बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ.
28 जुलाई को ही धुरकी की अर्चना कुमारी ने आधार में मोबाइल नंबर अपडेट कराने में परेशानी की शिकायत की. उनका कहना था कि शुल्क और जरूरी दस्तावेज देने के बाद भी उन्हें बार-बार केंद्र बुलाया जा रहा था. उन्होंने आधार केंद्र की कार्यशैली और कथित दुर्व्यवहार की शिकायत डीसी से की. इन मामलों में सवाल सिर्फ योजना का लाभ नहीं मिलने का नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि जिन शिकायतों का समाधान पंचायत या प्रखंड स्तर पर होना चाहिए, वे जिला मुख्यालय तक क्यों पहुंच रही हैं.
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राशन कार्ड बना, फिर भी तीन माह से नहीं मिला अनाज
एक सितंबर की जनसुनवाई में सदर प्रखंड के सुखबाना निवासी चंद्रदेव राम का मामला सामने आया. उनका राशन कार्ड बना हुआ था, लेकिन तीन माह से उन्हें अनाज नहीं मिला था. आवेदन में बताया गया कि राशन चालू कराने के लिए प्रखंड और जिला स्तर पर कई बार प्रयास किए गए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ.
गरीब परिवार के लिए सबसे जरूरी राशन जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी आखिरकार फरियादी को उपायुक्त के सामने पहुंचना पड़ा. इससे राशन वितरण व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया पर सवाल उठता है.
उज्ज्वला से आयुष्मान तक, लाभार्थियों को परेशानी
आठ सितंबर की जनसुनवाई में मेराल की विमला देवी ने शिकायत की कि वर्ष 2019 में उनके नाम से उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन स्वीकृत हुआ था, लेकिन इसका लाभ किसी दूसरे व्यक्ति को दिया जा रहा है.
वहीं, नगर ऊंटारी के पाल्हे कला निवासी दिवाकर चौबे आयुष्मान कार्डधारी होने के बावजूद मोतियाबिंद का ऑपरेशन नहीं करा पा रहे थे. उनका कहना था कि क्लीनिक में कार्ड काम नहीं करने की बात कही जाती है. दोनों मामले अलग-अलग योजनाओं से जुड़े हैं, लेकिन सवाल एक ही है कि पात्र व्यक्ति तक सरकारी योजना का लाभ पहुंचाने वाली व्यवस्था बीच में कहां अटक रही है.
दो माह के राशन के लिए भी DC दरबार पहुंची महिला
इसी जनसुनवाई में रमना की पुष्पा देवी ने जून और जुलाई का बकाया राशन दिलाने की मांग की. राशन कार्ड में पुत्री का नाम जुड़ने के बाद अगस्त से उसके नाम का राशन मिल रहा था, लेकिन पिछले दो माह का राशन नहीं मिला. दो माह के राशन के लिए भी एक महिला को जिला मुख्यालय पहुंचकर गुहार लगानी पड़ी. यह मामला भी बताता है कि छोटी शिकायतों का समाधान शिकायतकर्ता के जिला मुख्यालय पहुंचने से पहले ही हो जाना चाहिए.
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डीसी सुन रहे फरियाद, लेकिन नीचे की व्यवस्था पर सवाल
इन जनसुनवाइयों में एक बात लगातार सामने आती है. उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा फरियादियों की शिकायत सुन रहे हैं और संबंधित पदाधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं. इससे जिला स्तर पर शिकायत सुनने और उसे आगे बढ़ाने की व्यवस्था सक्रिय नजर आती है. लेकिन दूसरी तस्वीर ज्यादा महत्वपूर्ण है. कई फरियादियों ने अपनी शिकायत के स्थानीय स्तर पर आवेदन देने या समाधान का प्रयास करने की बात कही है. इसके बावजूद उन्हें जिला मुख्यालय का रुख करना पड़ा. इससे संकेत मिलता है कि समस्या शिकायतों की कमी नहीं, बल्कि शुरुआती स्तर पर शिकायतों के समाधान की क्षमता और जवाबदेही से जुड़ी है.
पंचायत से प्रखंड तक व्यवस्था, फिर डीसी तक क्यों?
पंचायत सरकार की सबसे निचली और लोगों के सबसे करीब की इकाई है. इसके बाद प्रखंड प्रशासनिक समन्वय का महत्वपूर्ण स्तर है. पेंशन बंद होने, राशन नहीं मिलने, आधार में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजना की राशि रुकने या सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलने जैसी शिकायतों के लिए यदि ग्रामीणों को जिला मुख्यालय आना पड़े, तो विकेंद्रीकृत प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
जनसुनवाई में पहुंची शिकायतें सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत परेशानियां नहीं बतातीं, बल्कि यह भी संकेत देती हैं कि पंचायत और प्रखंड स्तर पर शिकायतों को सुनने, दर्ज करने, समय पर उनका समाधान करने और फरियादी को इसकी जानकारी देने की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है.
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डीसी की सक्रियता से उम्मीद, नीचे भरोसा कायम करना चुनौती
इन मामलों में उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा शिकायतें सुनने और संबंधित पदाधिकारियों को निर्देश देने में सक्रिय नजर आते हैं. इससे लोगों का जिला प्रशासन के प्रति भरोसा बना हुआ है. लेकिन यही भरोसा पंचायत और प्रखंड स्तर पर भी कायम होना जरूरी है. यदि हर छोटी समस्या का अंतिम समाधान जिला मुख्यालय में ही तलाशा जाने लगे, तो जनसुनवाई शिकायतों के समाधान का माध्यम तो बनी रहेगी, लेकिन इससे निचले स्तर की व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होने का खतरा भी रहेगा. इन जनसुनवाइयों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि डीसी लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जहां आम लोगों को अपनी छोटी-छोटी समस्याएं लेकर जिला मुख्यालय तक आने की जरूरत ही न पड़े.
