सोन जल समझौते से गढ़वा में जगी सिंचाई की नई उम्मीद. कधवन-इंद्रपुरी परियोजना को मिल सकती है रफ्तार

सोन नदी जल बंटवारे पर हुए समझौते से गढ़वा में सिंचाई और पेयजल की समस्या दूर होने की उम्मीद है। जानिए कधवन-इंद्रपुरी परियोजना से जिले को क्या लाभ मिलेगा।

भवनाथपुर से विजय सिंह की रिपोर्ट

गढ़वा. बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर 25 वर्षों से चले आ रहे विवाद के समाधान का सीधा असर गढ़वा पर भी पड़ने की उम्मीद है. दोनों राज्यों के बीच हुए समझौते में झारखंड को सोन नदी का 2 एमएएफ पानी आवंटित करने पर सहमति बनी है. इससे लंबे समय से प्रस्तावित कधवन-इंद्रपुरी वृहद सोन जलाशय परियोजना के आगे बढ़ने की उम्मीद मजबूत हुई है. करीब 11,600 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इस बहुउद्देशीय परियोजना से गढ़वा को सिंचाई, पेयजल और जलसुरक्षा के क्षेत्र में बड़ा लाभ मिलने की संभावना है.

वर्षों से अटकी परियोजना को मिल सकती है रफ्तार

कधवन-इंद्रपुरी परियोजना का गढ़वा से सीधा संबंध है. परियोजना के तहत सोन नदी पर जलाशय और नहरों का विस्तृत नेटवर्क विकसित करने का प्रस्ताव है. झारखंड के हिस्से में सोन नदी के 2 एमएएफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने की संभावनाएं बढ़ी हैं.

बड़े हिस्से में सिंचाई की सुविधा

यदि प्रस्तावित नहर नेटवर्क गढ़वा के संबंधित क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो जिले के बड़े हिस्से में सिंचाई की सुविधा विकसित हो सकती है. गढ़वा में बड़ी आबादी की खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है. ऐसे में सोन का पानी कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है. खरीफ के साथ रबी फसलों की खेती का दायरा बढ़ने की उम्मीद है. धान, गेहूं, दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती को सिंचाई का सहारा मिलने से किसानों की बारिश पर निर्भरता कम हो सकती है.

12 गांवों पर पड़ेगा परियोजना का असर

परियोजना से जहां गढ़वा को विकास की उम्मीद है, वहीं इसके कारण जिले के 12 राजस्व गांव प्रभावित होंगे. इनमें केतार प्रखंड के खैरवा, चांदडीह, बिजडीह, गम्हरिया, पचाडूमर, छाताकुंड, बतों, मुनमुन और परती कुशवानी तथा खरौंधी प्रखंड के पिपरा, चंदना और खोखा शामिल हैं.

परियोजना के लिए 17,425 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण

तीन राज्यों में परियोजना से कुल 58 गांवों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है. परियोजना के लिए 17,425 हेक्टेयर से अधिक भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव है, जिसमें करीब 2,061 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल बतायी जाती है.

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परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे का सवाल

ऐसे में परियोजना की रफ्तार के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे का सवाल भी महत्वपूर्ण होगा. प्रभावित ग्रामीणों को उचित मुआवजा और पारदर्शी पुनर्वास उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती रहेगी.

सिंचाई के साथ पेयजल में भी राहत की उम्मीद

सोन नदी का पानी गढ़वा के लिए सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जलसुरक्षा मजबूत होने की उम्मीद है. जलाशय और नहरों के निर्माण से आसपास के क्षेत्रों में भूजल रिचार्ज बढ़ सकता है. इसका असर कुएं, चापाकल और अन्य जलस्रोतों पर भी पड़ सकता हैं. गर्मी के दिनों में पानी की समस्या से जूझने वाले ग्रामीण इलाकों को भी परियोजना से राहत मिलने की उम्मीद है.

करीब 450 मेगावाट पनबिजली उत्पादन

जलाशय और नहरों के निर्माण से आसपास के क्षेत्रों में जलस्रोतों और भूजल स्तर पर सकारात्मक असर पड़ सकता है. परियोजना में करीब 450 मेगावाट पनबिजली उत्पादन का भी प्रस्ताव है. इसके साकार होने पर क्षेत्र को ऊर्जा के क्षेत्र में भी लाभ मिल सकता है. इस तरह कधवन-इंद्रपुरी परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कृषि, पेयजल, ऊर्जा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली बहुउद्देशीय योजना के रूप में सामने आ सकती है.

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25 वर्षों से चला आ रहा था विवाद

वर्ष 2000 में झारखंड गठन के बाद अविभाजित बिहार को वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते के तहत मिले 7.75 एमएएफ सोन जल के बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच विवाद उत्पन्न हुआ था. अब नए समझौते के तहत बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ पानी देने पर सहमति बनी है. बताया गया कि 10 जुलाई 2025 को रांची में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में इस विवाद के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण सहमति बनी थी. इसके बाद तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर चली प्रक्रिया के बाद समझौते को अंतिम रूप दिया गया है.

गढ़वा के लिए क्या मायने रखता है समझौता

सोन नदी के पानी पर सहमति बनने के बाद अब गढ़वा की नजर कधवन-इंद्रपुरी परियोजना की अगली प्रक्रिया पर है. यदि परियोजना जमीन पर समयबद्ध तरीके से उतरती है और नहरों का नेटवर्क जिले तक पहुंचता है, तो वर्षा आधारित खेती वाले गढ़वा के बड़े हिस्से में सिंचाई का स्थायी विकल्प तैयार हो सकता है. सिंचाई सुविधा बढ़ने से खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आय तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है. हालांकि, परियोजना का वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब निर्माण, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और नहर नेटवर्क का काम निर्धारित समय सीमा में पूरा हो.

फिलहाल बिहार-झारखंड जल समझौते ने लंबे समय से लंबित कधवन-इंद्रपुरी परियोजना को लेकर गढ़वा में नई उम्मीद जरूर जगा दी है.

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By Avinash singh

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