जमीन व धन दान कर समाजसेवियों ने दिया गढ़वा शहर को स्वरूप

गढ़वा के विकास में स्थानीय लोगों का रहा बड़ा योगदान, शिक्षा और जलस्रोतों के निर्माण में निभायी अहम भूमिका

गढ़वा के विकास में स्थानीय लोगों का रहा बड़ा योगदान, शिक्षा और जलस्रोतों के निर्माण में निभायी अहम भूमिका पीयूष तिवारी, गढ़वा गढ़वा शहर आज जिस स्वरूप में नजर आता है, उसे संवारने में यहां के स्थानीय लोगों की भूमिका किसी भी सरकारी योगदान से कम नहीं रही है. शहरवासियों ने विकास कार्यों के लिए न केवल जमीन और धन दान किया, बल्कि अपनी मेहनत और ऊर्जा भी समर्पित की. साल 1924 में गढ़वा को यूनियन बोर्ड की मान्यता मिलने के बाद शहर में व्यवस्थित विकास की शुरुआत हुई. जब यहां शिक्षा के प्रसार की आवश्यकता महसूस की गयी, तब स्थानीय लोगों ने खुलकर सहयोग किया. साल 1929 में स्थापित गोविंद प्लस टू विद्यालय जिले का सबसे बड़ा सरकारी उच्च एवं प्लस टू विद्यालय है. इसकी स्थापना में शहर के सहिजना मोहल्ला के कायस्थ परिवारों और रंका राज परिवार का विशेष योगदान रहा. इन परिवारों ने करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन दान की और आर्थिक सहयोग देकर विद्यालय व उसके खेल मैदान की स्थापना करायी. बताया जाता है कि विद्यालय की शुरुआत दो खपरैल मकानों से हुई थी. आज यह विद्यालय आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है और जिले के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में शामिल है. विद्यालय में लगभग तीन हजार पुस्तकों से युक्त पुस्तकालय भी है. स्थापना के लगभग 100 वर्ष पूरे करने जा रहा यह विद्यालय आज भी निरंतर संचालित है. 1951 में दान की गयी जमीन पर बना रामा साहू विद्यालय जिले का एक अन्य प्रमुख शिक्षण संस्थान रामा साहू आर्य वैदिक प्लस टू विद्यालय, जिसे अब सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस व सीबीएसइ का दर्जा प्राप्त है की स्थापना वर्ष 1951 में रामाराम नकछेदी राम द्वारा की गयी थी. उन्होंने विद्यालय और खेल मैदान के लिए लगभग नौ एकड़ जमीन दान की. साल 1962 में उन्होंने अपने पिता रामा साहू के नाम पर प्राथमिक विद्यालय के दो कमरों का निर्माण भी अपने खर्च से कराया. आर्य समाज से जुड़े होने के कारण विद्यालय का नाम रामा साहू आर्य वैदिक विद्यालय रखा गया. इसके अलावा नकछेदी राम ने गढ़वा के मुख्य बाजार में आर्य समाज मंदिर (जहां निजी डीएवी मॉडल स्कूल संचालित है) तथा उसके बगल में सरकारी डीएवी मध्य विद्यालय के लिए भी अपनी जमीन दान की. दोनों संस्थानों में आज भी बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. 1956 में शुरू हुआ कन्या मध्य विद्यालय लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 1956 में शहर के मेन रोड पर कन्या मध्य विद्यालय के निर्माण की पहल की गयी. इसके लिए सरकार द्वारा 4.84 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गयी. विद्यालय आज भी संचालित है. हालांकि अस्पताल के पास स्थित इसकी कुछ जमीन पर वर्तमान में फुटबॉल मैदान बना दिया गया है. 1941 में समाजसेवी ने बनवाया मथूरा बांध आजादी से पहले गढ़वा मुख्य रूप से कृषि प्रधान क्षेत्र था और सिंचाई के साधनों की कमी थी. ऐसे समय में समाजसेवी मथूरा साव ने वर्ष 1941 में तिलैया नदी पर अपनी जमीन पर मथूरा बांध का निर्माण कराया. इससे क्षेत्र में सिंचाई और जल संग्रहण की सुविधा उपलब्ध हुई. बाद में उनके पुत्र रामचंद्र प्रसाद केसरी ने वर्ष 2016 में यहां एक और बांध का निर्माण कराया. दोनों बांध आज भी अपने मूल स्वरूप में हैं. मथूरा साव ने बांध के समीप भगवान शिव का मंदिर भी बनवाया था. उस समय शहर में जलस्रोतों की कमी होने के कारण लोग नदी और कुओं पर निर्भर रहते थे. ऐसे में यह बांध न केवल जल का स्रोत बना, बल्कि लोगों की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा भी बन गया. इसके बाद मथूरा साव के पुत्र रामनाथ केसरी ने अपनी जमीन दान कर यहां द्वैत आश्रम की स्थापना करायी, जो आज शहर का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बना हुआ है.

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By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

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