गढ़वा से अविनाश की रिपोर्ट
Garhwa Coffee With SDM: लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था का एक बुनियादी नियम है- अधिकारी आते-जाते रहते हैं, लेकिन जनता के हित में शुरू की गई अच्छी व्यवस्थाएं और परंपराएं चलती रहनी चाहिए. इसे ही प्रशासनिक भाषा में ‘लेगेसी’ (विरासत) कहा जाता है. लेकिन गढ़वा अनुमंडल कार्यालय में इन दिनों इस ‘लेगेसी’ पर ही सवालिया निशान लग गया है. तत्कालीन सदर एसडीएम संजय कुमार द्वारा शुरू किया गया और बेहद लोकप्रिय हो चुका जन-संवाद कार्यक्रम ‘कॉफी विद एसडीएम’ आज सरकारी नियमों और तकनीकी दलीलों के फेर में फंसकर बंद हो चुका है. परिणाम यह है कि जो अनुमंडल सभागार पिछले 75 हफ्तों से जनता की उम्मीदों और हक की आवाज से गूंजता था, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है.
प्रशासन और आमजन के बीच का रिश्ता थमता नजर आ रहा है
गढ़वा के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच आज यही सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या जनता के भरोसे को जिंदा रखना किसी नये अधिकारी का दायित्व नहीं है? आमतौर पर देखा जाता है कि जब भी कोई अधिकारी किसी जिले या अनुमंडल की कमान संभालता है, तो वह पूर्ववर्ती अधिकारी की अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी नयी कार्यशैली थोपने की कोशिश करता है. ‘कॉफी विद एसडीएम’ के बंद होने को भी लोग इसी चश्मे से देख रहे हैं. सरकारी नियम न होने का हवाला देकर इस जन-संवाद पर ब्रेक तो लगा दिया गया, लेकिन इसके साथ ही प्रशासन और आमजन के बीच का वह जीवंत रिश्ता भी थमता नजर आ रहा है जिसे बड़ी मुश्किल से 21 महीनों में खड़ा किया गया था.
76 हफ्तों का अटूट विश्वास
कॉफी विद एसडीएम में हर बुधवार को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंची प्रशासन की पहुंच. पंचायत प्रतिनिधियों, किसानों, युवाओं, महिलाओं और छात्रों ने सीधे साहब के सामने रखी अपनी बात. फाइलें दबाने की संस्कृति को खत्म कर ऑन-द-स्पॉट और त्वरित निष्पादन का बनाया नया रिकॉर्ड. इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी यूएसपी यह थी कि इसने गढ़वा में पारंपरिक बाबूशाही की उस मोटी दीवार को ढहा दिया था, जहाँ एक आम आदमी को साहब के चैंबर तक पहुंचने के लिए कई अर्दलियों और बाबुओं के चक्कर काटने पड़ते थे. कॉफी की एक प्याली के साथ शुरू होने वाली बातचीत ने जनता के मन से साहब का खौफ खत्म कर दिया था. नशामुक्ति, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक अभियानों की जो विरासत यह कार्यक्रम छोड़ गया है, उसे अचानक बंद कर देने से उस पूरी चेन को गहरा झटका लगा है.
नये एसडीएम ने क्या कहा?
इस पूरे लेगेसी विवाद और जनता की मायूसी के बीच गढ़वा के नवपदस्थापित सदर एसडीएम मयंक भूषण ने प्रशासनिक और सधा हुआ पक्ष रखा है. उन्होंने कहा कि जनता की समस्याओं को लेकर वे हमेशा गंभीर है और उनके लिए हर समय उपलब्ध हूं. हमारा मकसद प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक जन-उन्मुखी और पारदर्शी बनाना है. जहां तक ‘कॉफी विद एसडीएम’ जैसे पूर्व में चले कार्यक्रम की बात है, तो अगर इस संबंध में शासन प्रशासन की ओर से कोई नीतिगत दिशा-निर्देश प्राप्त होता है, तो उसका पूरा अध्ययन करने के बाद ही कोई उचित निर्णय लिया जाएगा. मेरा प्रयास यही रहेगा कि प्रशासन और जनता के बीच संवाद का जो पुल है, उसे पहले से भी ज्यादा मजबूत और सुलभ बनाया जाए.
लोगों ने क्या कहा?
इधर लोगों का कहना हैं कि प्रशासनिक सुधारों की दुनिया में वही अधिकारी इतिहास रचते हैं जो अच्छी परंपराओं और जन-हितैषी विरासतों को अहंकार से ऊपर उठकर गले लगाते हैं. ऐसे में अब देखना यह है कि क्या नये एसडीएम मयंक भूषण इस लोकप्रिय लेगेसी को कोई नया प्रशासनिक रूप देकर दोबारा जिंदा करते हैं, या फिर यह अनूठी पहल भी फाइलों के ढेर में दफन होकर रह जाएगी.
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