गढ़वा से अविनाश सिंह की रिपोर्ट
Garhwa News: झारखंड के गढ़वा की जीवनरेखा मानी जाने वाली सरस्वतिया नदी को उसका पुराना गौरव लौटाने के लिए चलाया जा रहा “आपन सरस्वतिया” महाअभियान अब जनभागीदारी का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है. लगातार 21वें दिन भी नदी के पुनर्जीवन का काम युद्धस्तर पर जारी रहा. मानसून के आगमन से पहले नदी की सफाई, डी-सिल्टिंग और चौड़ीकरण का काम तेज कर दिया गया है, ताकि बारिश शुरू होने से पहले अधिकतम कार्य पूरा किया जा सके. कभी उपेक्षा का शिकार रही नदी अब पूरे जिले के सामूहिक संकल्प का प्रतीक बनती दिखाई दे रही है.
21वें दिन भी जारी रहा महाअभियान
रविवार को सुबह नौ बजे से ही सरस्वतिया नदी के तट पर भारी मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी. आधा दर्जन से अधिक जेसीबी और अन्य पोकलेन मशीनों समेत कुल 12 मशीनों को काम में लगाया गया. वर्षों से जमा गाद, झाड़ियां, सूखे पेड़ और जलप्रवाह में बाधा उत्पन्न करने वाले मलबे को हटाने का कार्य तेजी से किया गया. मशीनों की संख्या बढ़ने से नदी तल की सफाई और चौड़ीकरण के काम में उल्लेखनीय प्रगति हुई. प्रशासन की कोशिश है कि मानसून की पहली बारिश से पहले नदी को अधिक से अधिक स्वच्छ और अविरल स्वरूप प्रदान किया जा सके.
एसडीएम संजय कुमार खुद संभाल रहे अभियान की कमान
गढ़वा के अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार इस अभियान की लगातार निगरानी कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि मानसून शुरू होने के बाद नदी में पानी भरने से गाद निकालने का काम प्रभावित हो सकता है. इसलिए अभी उपलब्ध समय का अधिकतम उपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि रविवार को मशीनों की संख्या बढ़ाई गई थी और यदि समाज के लोग तीन-चार दिनों के लिए कुछ और जेसीबी उपलब्ध करा दें, तो अभियान को और व्यापक स्तर पर संचालित किया जा सकता है. एसडीएम ने कहा कि प्रशासन का लक्ष्य सिर्फ नदी की सफाई नहीं, बल्कि इसे स्थायी रूप से पुनर्जीवित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ उठा सकें.
जनआंदोलन का रूप ले चुका है “आपन सरस्वतिया”
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल सरकारी कार्यक्रम बनकर नहीं रह गया है, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुका है. शहर के कई प्रबुद्ध नागरिक और समाजसेवी इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. एसडीएम संजय कुमार ने अभियान को सहयोग देने वाले सभी लोगों का आभार व्यक्त किया. इनमें समाजसेवी राकेश पाल, केसरवानी वैश्य सभा के अध्यक्ष संतोष केसरी, व्यवसायी संघ के अध्यक्ष राजेश गुप्ता, संत मरियम आवासीय विद्यालय डालटनगंज के चेयरमैन अविनाश देव और समाजसेवी विकास माली प्रमुख रूप से शामिल हैं. प्रशासन का मानना है कि जनता और प्रशासन के संयुक्त प्रयास से ही इस अभियान को स्थायी सफलता मिल सकती है.
मेराल क्षेत्र में भी लगातार चल रहा सफाई अभियान
गढ़वा शहर के अलावा मेराल क्षेत्र में भी पिछले 15 दिनों से सरस्वतिया नदी की सफाई का काम लगातार जारी है. यहां अंचलाधिकारी, जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों के आपसी समन्वय से अभियान को गति मिली है. एसडीएम संजय कुमार ने मेराल क्षेत्र के लोगों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर सामूहिक प्रयासों से नदी संरक्षण का संदेश मजबूत हुआ है.
नदी में कचरा फेंकने वालों को चेतावनी
जहां एक ओर जागरूक नागरिक नदी को बचाने में जुटे हुए हैं, वहीं कुछ लोग अब भी नदी में कचरा और अपशिष्ट फेंककर अभियान की भावना को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं. इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए एसडीएम संजय कुमार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि ऐसे लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी. इसके लिए नगर परिषद को भी अलर्ट मोड में रखा गया है. उन्होंने कहा कि नदी को डस्टबिन समझने वालों के खिलाफ किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी.
नगर परिषद की भूमिका पर भी उठे सवाल
अभियान के दौरान कुछ स्थानीय लोगों ने शिकायत की है कि कई मोहल्लों से समय पर कचरा नहीं उठाया जा रहा है. इतना ही नहीं, आरोप यह भी लगाया गया है कि कुछ स्थानों पर नगर परिषद के कर्मचारी ही नदी क्षेत्र में कचरा फेंक रहे हैं. इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम संजय कुमार ने कहा कि यदि जांच में नगर परिषद की लापरवाही या संलिप्तता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मियों की जवाबदेही तय की जाएगी और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने साफ कहा कि सरस्वतिया नदी को स्वच्छ और अविरल बनाने के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
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सरस्वतिया को फिर से जीवन देने की मुहिम
“आपन सरस्वतिया” अभियान अब केवल सफाई कार्यक्रम नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता का एक प्रेरणादायी उदाहरण बनता जा रहा है. प्रशासन और समाज के संयुक्त प्रयासों से उम्मीद की जा रही है कि मानसून की बूंदें गिरने से पहले सरस्वतिया नदी एक बार फिर अपने निर्मल और निर्झर स्वरूप में लौटती नजर आएगी. इंसान अक्सर नदियों को तब याद करता है, जब वे सूखने लगती हैं. गढ़वा में कम से कम कुछ लोगों ने यह एहसास समय रहते कर लिया है.
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