घाटशिला. ब-ए-बारात के मौके पर घाटशिला, मऊभंडार, फूलपाल, नवाबकोठी, गालूडीह, मुसाबनी, नरसिंगढ़, चाकुलिया समेत आस-पास के इलाकों की मस्जिदों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया. शब-ए-बरात को लेकर मुस्लिम समुदाय में खासा उत्साह देखने को मिला. घाटशिला मुस्लिम बस्ती जामे मस्जिद के इमाम मोहम्मद जमालउद्दीन जफर मिस्बाही ने शब-ए-बरात की अहमियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि यह रात पूरी तरह इबादत और अल्लाह ताला की बंदगी के लिए समर्पित है. उन्होंने बताया कि हुजूर की सुन्नत के अनुसार लोग कब्रों की जियारत करते हैं. वहां फातिहा पढ़कर मरहूमीन की रूह के लिए दुआ करते हैं. इमाम ने बताया कि शब-ए-बरात की रात इबादत के बाद अगले दिन रोजा रखने की परंपरा भी है.
शब-ए-बारात मनाने का मुख्य कारण :
क्षमा की रात ( मगफिरत) ””शब”” का अर्थ रात और ””बरात”” का अर्थ बरी (मुक्ति) होना है. यह रात जहन्नुम (नरक) से बरी होने और अल्लाह की रहमत पाने के लिए विशेष मानी जाती है. इसमें सच्चे मन से तौबा करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं. इस्लामी मान्यता के अनुसार इस रात अल्लाह अगले एक साल के लिए बंदों की किस्मत, रोजी-रोटी और जीवन-मरण का फैसला करते हैं. मुस्लिम भाई रातभर जागकर नमाज, कुरान की तिलावत करते हैं. दुनिया की सलामती के लिए दुआ मांगते हैं. इस रात कब्रिस्तान में जाकर अपने पूर्वजों की कब्रों पर फातिहा पढ़ी जाती है. उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है. सुन्नी मुसलमान इसे इबादत की रात मानते हैं. सिया मुसलमान इसे 12वें इमाम, मुहम्मद अल-महदी के जन्मदिन (15 शाबान) के रूप में मनाते हैं. यह इबादत, रहमत और माफी की रात है.