जमीन के नीचे करोड़ों का पन्ना-नीलम, ऊपर सुविधाओं को तरस रही 50 हजार की आबादी

पूर्वी सिंहभूम के गुड़ाबांदा में पन्ना और नीलम का अकूत भंडार है, लेकिन माफिया राज और सरकारी उपेक्षा के कारण 50 हजार की आबादी बुनियादी सुविधाओं को तरस रही है।

मो.परवेज/कुश महतो की रिपोर्ट

पूर्वी सिंहभूम जिले में ओडिशा सीमा से सटे गुड़ाबांदा प्रखंड की धरती के नीचे करोड़ों रुपये के उच्च गुणवत्ता वाले रत्न पन्ना और नीलम का अकूत भंडार दबा है. वहीं यहां के ग्रामीण आज भी बदहाल जिंदगी जीने को विवश हैं. घाटशिला अनुमंडल मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित प्रखंड में वर्ष 2012 में पहली बार पन्ना खदान की मौजूदगी सामने आयी थी. करीब 15 वर्ष बाद भी सरकार इन खदानों की नीलामी नहीं कर सकी है. इसका नतीजा है कि सरकार को राजस्व और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने के बजाय यहां से रत्नों की अवैध लूट बदस्तूर जारी है. कभी नक्सलवाद की आग में झुलसने वाले इस इलाके में वर्ष 2017 में नक्सली कमांडर कान्हू मुंडा के आत्मसमर्पण के बाद शांति तो लौटी, लेकिन अब यहां अवैध खनन और माफिया राज कायम हो चुका है.

दो बार सर्वे कर रिपोर्ट सौंप चुका है भूतत्व विभाग

वर्ष 2020-21 और 2022-23 में भूतत्व विभाग ने दो बार विस्तृत सर्वे कराया था. राज्य और केंद्र सरकार को भेजी गयी रिपोर्ट में कहा गया कि करीब 38 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 20 मीटर की गहराई तक उच्च गुणवत्ता वाले पन्ना और नीलम के भंडार मौजूद हैं. कोलकाता स्थित जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की प्रयोगशाला में परीक्षण के बाद इस रत्न की उच्च गुणवत्ता प्रमाणित भी हो चुकी है, इसके बावजूद फाइलें आगे नहीं बढ़ सकी हैं.

सील खदानों से अवैध खनन पर उठ रहे गंभीर सवाल

प्रशासनिक स्तर पर दावा किया जाता है कि पन्ना खदानों को पूरी तरह सील कर दिया गया है. इसके उलट स्थानीय ग्रामीणों के बीच यह चर्चा आम है कि बंद खदानों से चोरी-छिपे खनन आज जारी है. ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि यदि खदानें पूरी तरह सील हैं, तो खुले बाजार में गुड़ाबांदा का पन्ना आखिर कहां से पहुंच रहा है. क्षेत्र में दबी जुबान से यह भी चर्चा है कि माफिया तत्वों द्वारा मशीनों से पानी निकाल कर खदानों के भीतर से रत्न निकाले जा रहे हैं और इन्हें अवैध रूप से दूसरे राज्यों में खपाया जा रहा है.

खनिज संपदा के बीच फटेहाल हैं पहाड़ की तलहटी पर बसे गांव

पन्ना खदान वाले पहाड़ की तलहटी पर बसे गुड़ाबांदा के बारूणमुठी, ठुरकूगोड़ा, बाउटिया और चिड़ियापहाड़ जैसे गांवों की तस्वीर वर्षों बाद भी नहीं बदली है. यहां के लोग सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के घोर अभाव में जी रहे हैं.

सड़क व परिवहन: कई गांवों तक जाने के लिए आज भी पक्की सड़क नहीं है, लोग पगडंडियों के सहारे आवागमन करने को विवश हैं.

पेयजल संकट: करीब 70 परिवारों की 600 से अधिक आबादी मात्र एक जलमीनार के भरोसे है. जल-नल योजना के तहत पाइप लाइन तो बिछी है, लेकिन अधिकतर घरों तक पानी नहीं पहुंचता.

शिक्षा व स्वास्थ्य की बदहाली: गांव के स्कूल में पहली से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है, लेकिन 42 बच्चों को पढ़ाने के लिए केवल दो शिक्षक तैनात हैं. स्कूल का चापाकल पिछले छह महीने से खराब है, जिससे बच्चे और ग्रामीण आयरनयुक्त दूषित पानी पीने को विवश हैं.

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी से ग्रामीणों में भारी आक्रोश

गुड़ाबांदा प्रखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसकी आठ पंचायतों में से चार घाटशिला और चार बहरागोड़ा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं. इसके बावजूद आज तक क्षेत्र के किसी भी विधायक या सांसद ने इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे को सदन में प्रभावी ढंग से नहीं उठाया. स्थानीय जनप्रतिनिधियों की इस चुप्पी पर ग्रामीण अब सवाल खड़े कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाकर इन खदानों की पारदर्शी नीलामी कराए, तो न केवल पूरे क्षेत्र की तकदीर बदल जायेगी, बल्कि हजारों स्थानीय युवाओं को रोजगार के नये अवसर मिलेंगे.

क्या कहते हैं ग्रामीण?

फिलहाल आधिकारिक रूप से खनन बंद है. यदि रात में कोई अवैध खनन कर रहा है, तो इसकी जानकारी नहीं है. यदि भविष्य में खदान खोलने की योजना बनती है, तो ग्रामीणों की सहमति जरूरी होगी.- लालमोहन किस्कू, ग्राम प्रधान

पहले स्थानीय युवाओं को मजदूरी मिल जाती थी, लेकिन अब अधिकतर युवक रोजगार के लिए बाहर पलायन कर चुके हैं. अवैध खनन यदि हो रहा है, तो बाहरी लोग कर रहे होंगे. - शुरूबली किस्कू, ग्रामीण

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पन्ना खनन शुरू करने संबंधी कोई आधिकारिक सूचना नहीं है. यदि चोरी-छिपे खनन की शिकायत मिलती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी. - सुनाराम सबर, वनपाल

खदान पूरी तरह सील है. यदि बंद खदान में अवैध खनन की सूचना मिलती है. तो जल्द ही छापेमारी कर कार्रवाई की जायेगी.- डांगुर कोड़ाह, अंचलाधिकारी, गुड़ाबांदा


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लेखक के बारे में

By Mdparwez

मो. युनूस परवेज वर्ष 1995 से पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने घाटशिला महाविद्यालय और रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और राजनीतिक विज्ञान ऑनर्स की डिग्री हासिल की है. इनकी राजनीति, अपराध, नक्सलवाद, खेल, शिक्षा और खेती किसानी की खबरों में विशेष रुचि है. डिजिटल जर्नलिज्म में 5 साल का अनुभव है.

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