संवाददाता, रानीश्वर: दुमका जिले के रानीश्वर प्रखंड के सादीपुर गांव स्थित लायेकपाड़ा दुर्गा मंदिर में करीब 46 साल से बकरे की बलि नहीं दी जाती है. इसके पीछे एक ऐसी घटना है, जिसे याद कर आज भी ग्रामीण उस दौर को याद करते हैं. बकरे की बलि रोकने के लिए गांव के रहने वाले और रघुनाथपुर हाईस्कूल के सेवानिवृत्त शिक्षक निताई पद लायेक ने अपनी जान की परवाह तक नहीं की थी.
पशुप्रेमी निताई पद लायेक ने करीब 46 वर्ष पहले मंदिर में बकरे की बलि की परंपरा को अनुचित मानते हुए इसे बंद कराने का फैसला किया था. उन्होंने पहले पुजारी और ग्रामीणों से बातचीत की, लेकिन उनकी बात पर किसी ने सहमति नहीं जतायी.
पुजारी और ग्रामीण नहीं माने, संत से भी मांगी मदद
निताई पद लायेक ने बताया कि उन्होंने मंदिर के पुजारी और ग्रामीणों से बकरे की बलि बंद करने को लेकर चर्चा की थी. लेकिन उस समय किसी ने उनका समर्थन नहीं किया. इसके बाद उन्होंने एक संत से भी इस परंपरा को बंद कराने की पहल करने का अनुरोध किया, लेकिन वह भी इसके लिए तैयार नहीं हुए.
इसके बाद निताई पद लायेक ने खुद ही बलि की परंपरा रोकने का संकल्प ले लिया.
बलि की तैयारी हुई तो मालखुंटा में डाल दी गर्दन
मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने बकरे की बलि चढ़ाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी. बलि देने की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी. तभी निताई पद लायेक ने ऐसा कदम उठाया, जिससे वहां मौजूद लोग हैरान रह गये.
उन्होंने बकरे की बलि देने वाले मालखुंटा में अपनी गर्दन डाल दी. इसके बाद उन्होंने कहा कि अगर बलि देना ही है तो पहले उनकी बलि दी जाए. उन्होंने साफ कहा कि पहले उनकी बलि चढ़ेगी और उसके बाद ही बकरे की बलि दी जाएगी.
उनके इस कदम के बाद मौके पर मौजूद लोग पीछे हट गये और बकरे की बलि नहीं दी गयी.
मामला थाने तक पहुंचा, कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हुई
घटना के बाद मामला थाने तक पहुंचा था. निताई पद लायेक पर कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गयी थी. हालांकि, उस समय क्षेत्र के विधायक बाबूलाल किस्कू ने उनका साथ दिया.
इसके बाद लायेकपाड़ा दुर्गा मंदिर में बकरे की बलि की परंपरा बंद हो गयी. तब से आज तक करीब 46 वर्षों से यहां दुर्गा पूजा बिना बकरे की बलि के होती आ रही है.
एक कदम ने बदल दी मंदिर की परंपरा
आज निताई पद लायेक सेवानिवृत्त हैं और पशुप्रेमी के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. करीब साढ़े चार दशक पहले बकरे की बलि रोकने के लिए उठाया गया उनका कदम आज मंदिर की पूजा परंपरा का हिस्सा बन चुका है.
सादीपुर के लायेकपाड़ा दुर्गा मंदिर की यह कहानी बताती है कि एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प किस तरह वर्षों पुरानी परंपरा में बदलाव ला सकता है.
