प्रतिनिधि, दुमका: झारखंड के स्कूली शिक्षा विभाग की कार्रवाई से दुमका के 153 सहायक अध्यापकों की नौकरी और आजीविका को लेकर संकट की स्थिति पैदा हो गयी है. शिक्षकों के अनुसार उन्हें अप्रैल 2025 से वेतन नहीं मिला है. अब इन 153 सहायक अध्यापकों ने विभागीय आदेशों के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया है. 21 सितंबर को मामले में बहस होने की बात कही गयी है.
शिक्षकों को भेजी गयी चिट्ठी में उनकी डिग्री को अमान्य संस्थानों से प्राप्त बताया गया है और इसी आधार पर सेवा समाप्ति की सूचना दी गयी है. हालांकि मामले में अंतिम स्थिति न्यायिक प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होगी.
2001-03 में ग्राम शिक्षा समिति के माध्यम से हुई थी नियुक्ति
शिक्षकों के अनुसार वर्ष 2001-03 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत ग्राम शिक्षा समिति के माध्यम से पारा शिक्षकों की नियुक्ति की गयी थी. उस समय न्यूनतम योग्यता मैट्रिक रखी गयी थी. वर्ष 2005 में न्यूनतम योग्यता बढ़ाकर इंटरमीडिएट कर दी गयी.
शिक्षकों का कहना है कि कार्यरत शिक्षकों को इस दौरान न तो अवकाश दिया गया और न ही यह निर्देश दिया गया कि उन्हें किस संस्थान से आगे की पढ़ाई करनी है. इसी वजह से कई शिक्षकों ने प्रयाग महिला विद्यापीठ, उत्तर प्रदेश और हिंदी विद्यापीठ, इलाहाबाद समेत अन्य संस्थानों से डिग्री प्राप्त की.
शिक्षकों का दावा, विभाग ने पहले किया था सत्यापन
शिक्षकों का कहना है कि इन डिग्रियों का विभाग की ओर से सत्यापन किया गया था. इसके बाद वेतनमान शुरू किया गया. शिक्षकों के अनुसार वर्ष 2022 में सेवा शर्त नियमावली बनने के बाद इन डिग्रियों का दोबारा फिजिकल वेरिफिकेशन भी कराया गया.
शिक्षकों का दावा है कि विभागीय प्रतिनिधियों ने संस्थानों में जाकर सत्यापन किया था और इसके बाद ही उन्हें आकलन परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली थी.
लोन और दूसरी सुविधाएं मिलने का भी दावा
शिक्षकों के अनुसार डिग्री के सत्यापन के बाद उन्हें ईपीएफ की सुविधा, चार प्रतिशत वार्षिक वेतन वृद्धि और बैंक लोन की पात्रता जैसी सुविधाएं भी मिलीं. शिक्षकों का दावा है कि इन्हीं मानकों के आधार पर कई शिक्षकों ने बैंकों से लाखों रुपये का लोन भी लिया है.
अप्रैल 2025 में मानव संसाधन विकास विभाग के एसडी तिग्गा की ओर से सभी जिलों को भेजे गये पत्र में संबंधित संस्थानों की डिग्रियों को अमान्य बताया गया और उनके आधार पर शिक्षकों की सेवा समाप्त करने का निर्देश दिया गया.
एसएमसी के अधिकार पर भी शिक्षकों ने उठाया सवाल
शिक्षकों की एक प्रमुख आपत्ति यह है कि उन्हें बर्खास्त करने का आदेश स्कूल प्रबंधन समिति यानी एसएमसी की ओर से दिया जा रहा है. उनका कहना है कि नियमानुसार एसएमसी को बर्खास्तगी का अधिकार नहीं है.
शिक्षकों ने बर्खास्तगी की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाये हैं. उनके अनुसार पश्चिमी सिंहभूम जिले में केवल हिंदी विद्यापीठ की डिग्रियों को अमान्य माना गया है, जबकि अन्य जिलों में पांच संस्थानों की डिग्रियों को खारिज किया गया है.
काम लिया जा रहा, लेकिन वेतन बंद होने का दावा
शिक्षकों ने विभाग की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर बर्खास्तगी की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर उनसे रिपोर्टिंग कार्य, एमडीएम वितरण और प्रशिक्षण जैसे काम लिये जा रहे हैं.
शिक्षकों के अनुसार अप्रैल 2025 से दुमका के सभी 153 सहायक अध्यापकों का वेतन बंद है, जबकि उनकी सेवाएं जारी हैं. उनका कहना है कि जब विभाग को संबंधित संस्थानों की मान्यता की जांच करने में 20 से 25 साल लग गये, तो शिक्षकों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे वर्ष 2005 में ही संस्थानों की वैधता की जानकारी रखते.
विभाग ने कहा, निर्देश के अनुसार हो रही कार्रवाई
मामले में जिला शिक्षा अधीक्षक लक्ष्मण यादव ने बताया कि विभाग की ओर से निर्देश जारी किया गया है. जिन पारा शिक्षक-शिक्षिकाओं ने अमान्य संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की है, उनके लिए विभाग की ओर से निर्देश दिया गया है.
