दुमका से आनंद जायसवाल की रिपोर्ट
Dumka News : दुमका में वर्षा की मात्रा से अधिक अब उसका समय और वितरण बदल रहा है. वर्ष 1991 से 2025 तक के वर्षापात, बरसाती दिनों और मौसमवार वितरण के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि जिले की पारंपरिक मानसूनी संरचना धीरे-धीरे बदल रही है. यह बदलाव आने वाले वर्षों में कृषि उत्पादन, जल संरक्षण और फसल नीति को सीधे प्रभावित कर सकता है. अध्ययन के अनुसार, दुमका में कुल बरसाती दिनों में बहुत बड़ी गिरावट नहीं दिखती, लेकिन बारिश का स्वरूप तेजी से बदला है. 1991-95 के दौरान औसतन 67.4 दिन बारिश होती थी, जबकि 2021-25 में यह घटकर 66.8 दिन रह गई. पहली नजर में यह सामान्य बदलाव लगता है, लेकिन जब मौसमवार विश्लेषण किया गया तो तस्वीर अलग दिखी. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव खरीफ में दर्ज हुआ. 1991-95 में खरीफ के दौरान औसतन 57 दिन वर्षा होती थी, जो 2021-25 में घटकर 53 दिन रह गई. खेती के मुख्य मौसम में करीब चार दिन कम बारिश दर्ज हो रही है. इसके उलट गर्मी के मौसम में बरसाती दिन 6.2 से बढ़कर 10.6 दिन हो गये. यह बदलाव बताता है कि वर्षा अब अपने पारंपरिक समय से बाहर निकल रही है.
खरीफ में घट रही बारिश, गर्मी के मौसम में ढाई गुना बढ़ोतरी दर्ज
केवल दिनों का नहीं, वर्षा वितरण का आंकड़ा और बड़ा संकेत देता है. 1991-95 में जिले की कुल वर्षा का 88.3 प्रतिशत हिस्सा खरीफ में होता था. 2021-25 तक यह घटकर 82.5 प्रतिशत रह गया. दूसरी ओर गर्मी की वर्षा 6.6 प्रतिशत से बढ़कर 15.3 प्रतिशत तक पहुंच गई. यानी लगभग ढाई गुना वृद्धि दर्ज हुई. सर्दी के मौसम की वर्षा भी 5.1 प्रतिशत से घटने के बाद फिर बढ़कर 2.2 प्रतिशत के आसपास स्थिर हुई.
बारिश का समय बदला, सितंबर में कमी से फसलों पर बढ़ा खतरा
मौसमवार कुल वर्षा का विश्लेषण बताता है कि खरीफ की कुल बारिश 1991-95 के 1016.3 मिमी से बढ़कर 2006-10 में 1308.4 मिमी तक पहुंची थी, लेकिन इसके बाद स्थिरता नहीं बनी और 2021-25 में यह घटकर 1165.5 मिमी रह गई. इसके विपरीत गर्मी की कुल वर्षा 76.1 मिमी से बढ़कर 216.5 मिमी हो गई. इसका मतलब यह नहीं कि कुल पानी कम हो गया, बल्कि पानी आने का समय बदल गया. 2025 के खरीफ सीजन के आंकड़े इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करते हैं. जून में सामान्य से 70 मिमी अधिक, जुलाई में 72.4 मिमी अधिक और अगस्त में 37 मिमी अधिक वर्षा दर्ज हुई थी. लेकिन सितंबर में अचानक स्थिति उलट गई थी और औसत से 125.6 मिमी कम वर्षा हुई. यही वह समय होता है जब धान में बाली निकलने और दाना बनने की प्रक्रिया चलती है. ऐसे में शुरुआती अधिक बारिश और अंतिम चरण में कमी सीधे उपज को प्रभावित कर सकती है.
कम दिनों की तेज बारिश से जलभराव और नमी संकट बढ़ा
कृषि विज्ञान के दृष्टिकोण से यह पैटर्न चिंता का विषय माना जा रहा है. कम दिनों में अधिक वर्षा होने से खेतों में जलभराव बढ़ता है, लेकिन भूजल पुनर्भरण घटता है. तेज बारिश मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को बहा देती है और बाद के सूखे अंतराल में फसल नमी संकट झेलती है.
विशेषज्ञ मानते हैं
विशेषज्ञ मानते हैं कि दुमका की कृषि नीति अब केवल औसत वर्षा पर नहीं, बल्कि वर्षा के समय, तीव्रता और वितरण पर आधारित होनी चाहिए. धान प्रधान मॉडल के साथ फसल विविधीकरण, खेत तालाब, जल संचयन और मौसम आधारित कृषि योजना को प्राथमिकता देने की जरूरत है.
एक्सपर्ट बोले
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, दुमका स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कुमार शैलेंद्र मोहन बोले , इस क्षेत्र की मानसूनी संरचना धीरे-धीरे बदल रही है. दुमका में वर्षा काफी अच्छी होती है. यहां वर्षापात की कमी नहीं, बल्कि अब चिंता उसके बदलते स्वरूप काे लेकर है. आने वाले वर्षों में खेती को बचाने के लिए कृषि कैलेंडर और जल प्रबंधन दोनों को बदलना होगा.
झारखंड बायोडाइवर्सिटी बोर्ड के सदस्य और एएन कॉलेज, दुमका के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अमरनाथ सिंह बोले, यह सभी जलवायु परिवर्तन की देन है. ग्लैशियर पिघल रहा है. इसलिए प्रकृति में परिवर्तन हो गया है. वर्षापात असामान्य हो गया है. फसल को नुकसान और मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है. इसलिए अधिक से अधिक बहुवर्षीय पेड़ लगाने होंगें. फसल चक्र बदलना होगा.
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