दुमका : दुमका प्रखंड के माचखिचा गांव में लेखा होड़ की पहल पर परंपरागत स्वशासन व्यवस्था मांझी-परगना के तहत कुल्ही दुरुप (ग्रामसभा) का आयोजन किया गया. इस दौरान ओलचिकी जागरूकता अभियान चलाया गया. बैठक में संताली भाषा के लिए ‘एक भाषा-एक लिपि’ की अवधारणा को अपनाने की मांग उठायी गयी. बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान राजा मरांडी ने की.
ओलचिकी लिपि के महत्व पर हुई चर्चा
बैठक में लेखा होड़ और ग्रामीणों ने संताली भाषा की ओलचिकी लिपि के महत्व पर चर्चा की. ग्रामीणों ने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने वर्ष 1925 में ओलचिकी लिपि का आविष्कार किया था. ओलचिकी लिपि के 101 वर्ष पूरे हो चुके हैं. वर्ष 2003 में संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया. वहीं, झारखंड सरकार ने पिछले वर्ष से बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती पर सरकारी अवकाश घोषित किया है.
‘एक भाषा-एक लिपि’ अपनाने की मांग
ग्रामीणों ने कहा कि संताली भाषा वर्तमान में बंगाली, उड़िया, देवनागरी, असमिया और रोमन समेत अलग-अलग लिपियों में लिखी जा रही है. अलग-अलग लिपियों के इस्तेमाल से संताली साहित्य के विकास, प्रसार और एकरूपता पर असर पड़ रहा है. एक क्षेत्र में लिखा गया संताली साहित्य दूसरे क्षेत्र के लोग आसानी से नहीं पढ़ पाते हैं. ऐसे में संताली भाषा के लिए ‘एक भाषा-एक लिपि’ की अवधारणा को अपनाना समय की जरूरत है. इससे संताल समाज को एक सूत्र में जोड़ने के साथ संताली भाषा और साहित्य के विकास को भी गति मिलेगी.
मातृभाषा में शिक्षा पर दिया जोर
कुल्ही दुरुप में संताल समाज में बढ़ते स्कूल ड्रॉपआउट पर भी चिंता जतायी गयी. ग्रामीणों ने कहा कि बच्चों को मातृभाषा संताली में शिक्षा उपलब्ध नहीं होने के कारण उनका पढ़ाई के प्रति जुड़ाव कमजोर हो रहा है. मातृभाषा आधारित शिक्षा से बच्चों की समझ, रुचि और विद्यालय से जुड़ाव मजबूत किया जा सकता है.
केजी से पीजी तक ओलचिकी माध्यम से पढ़ाई की मांग
बैठक के माध्यम से मुख्यमंत्री, सभी सांसदों और विधायकों से केजी से पीजी तक संताली ओलचिकी माध्यम से पढ़ाई शुरू कराने, ओलचिकी शिक्षकों की जल्द बहाली करने, संताली भाषा को झारखंड की प्रथम राज्य भाषा घोषित करने तथा संताल बहुल क्षेत्रों के सरकारी कार्यालयों के नामपट्ट हिंदी के साथ ओलचिकी संताली में अनिवार्य रूप से लिखने की मांग की गयी. इस अवसर पर ओलचिकी के प्रचार-प्रसार और अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए पुस्तकों का वितरण भी किया गया. बैठक के बाद ग्रामीणों ने मांझी थान में माथा टेका.
बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे मौजूद
मौके पर पालटन हेम्ब्रम, सुशील मरांडी, बुधन हांसदा, मुनु मुर्मू, जीवन टुडू, ढेना सोरेन, फूल सोरेन, एलिजाबेथ मरांडी, सुकुरमुनि टुडू, मरयम मुर्मू, बोड़ हेम्ब्रम, सोहागनी मरांडी, चुड़की मुर्मू, हिरामुनी टुडू, अर्जुन मुर्मू, बिटीयह सोरेन, मकु मुर्मू, बाबुसोल हांसदा, समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन समेत बड़ी संख्या में महिला, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे मौजूद थे.
