धनबाद. दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) में कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (सीएमपीएफओ) के निवेश से जुड़े मामले में झारखंड हाइकोर्ट ने गंभीर टिप्पणियां की हैं. मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब विभागीय और आंतरिक सतर्कता जांच अभी पूरी नहीं हुई है, तब सीएमपीएफओ के पूर्व कमिश्नर अनिमेष भारती को लगभग दोषमुक्त बताने वाला निष्कर्ष कैसे दर्ज किया गया. अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए मामले में विस्तृत जवाब तलब किया है.
निवेश और नुकसान को लेकर विवाद
जनहित याचिका दायर करने वाले संजीव श्रीवास्तव का दावा है कि सीएमपीएफओ ने डीएचएफएल में 1390.25 करोड़ रुपये का निवेश किया था. याचिका के अनुसार, विशेषज्ञों और फंड मैनेजरों द्वारा राशि निकालने की सलाह दिये जाने के बावजूद करीब छह माह तक निवेश वापस नहीं लिया गया. बाद में डीएचएफएल के दिवालिया होने से संगठन को 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
हालांकि, सीएमपीएफओ ने इस दावे पर आपत्ति जतायी है. संगठन का कहना है कि वास्तविक नुकसान इससे कम है. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि नुकसान की राशि को लेकर भले ही दोनों पक्षों के आंकड़ों में अंतर हो, लेकिन मामला सैकड़ों करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन से जुड़ा है और इसकी गंभीरता से अनदेखी नहीं की जा सकती.
हलफनामे की टिप्पणी पर अदालत की आपत्ति
सीएमपीएफओ के रीजनल कमिश्नर-2 पंकज कुमार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि पूर्व कमिश्नर अनिमेष भारती के खिलाफ 17 मई 2024 को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट जारी की गयी थी. हलफनामे में यह भी कहा गया कि मामला दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की प्रक्रिया से उत्पन्न व्यावसायिक नुकसान का है तथा इसमें आपराधिक साजिश या आपराधिक विश्वासघात का कोई तत्व नहीं दिखता.
अदालत ने इस निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब विभागीय जांच और सतर्कता जांच अभी पूरी नहीं हुई है, तब इस तरह का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने इसे प्रथमदृष्टया अनुचित बताया.
मंत्रालय और सीबीआई से मांगा जवाब
खंडपीठ ने कोयला मंत्रालय के सचिव तथा संयुक्त सचिव-सह-वित्त सलाहकार को 30 सितंबर तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत ने पूछा है कि मामले में आपराधिक कार्रवाई या एफआईआर दर्ज करने संबंधी कोई प्रस्ताव विचाराधीन है या नहीं.
साथ ही सीबीआई को भी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. अदालत ने कहा कि याचिका में लगाये गये आरोपों और जांच पूरी होने से पहले की गयी कथित दोषमुक्ति संबंधी टिप्पणियों के मद्देनजर जांच एजेंसी का पक्ष जानना आवश्यक है.
अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी अधिकारियों का विवेकाधिकार असीमित या मनमाना नहीं हो सकता. किसी भी निर्णय से पहले सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है. कोर्ट ने प्रथमदृष्टया यह भी टिप्पणी की कि मामले में जांच की गंभीरता को लेकर प्रश्न उठते हैं. मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गयी है.
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