मधुपुर से गहरा लगाव रहा है शिबू सोरेन का, इमरजेंसी के दौरान गांव में भूमिगत होते थे

दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से पूरे इलाके में शोक की लहर है

मधुपुर. दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से पूरे इलाके में शोक की लहर है. गुरुजी का मधुपुर से बहुत गहरा लगाव रहा है. बताया जाता है कि 4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ मैदान में जब झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था तब मधुपुर से छात्र नेता घनश्याम व विश्वनाथ आदि रात भर सभा में उनके साथ थे. शिबू सोरेन छात्र नेता अरविंद कुमार और घनश्याम को काफी मानते थे. समाज कर्मी घनश्याम ने बताया कि गुरुजी जेपी आंदोलन को नैतिक समर्थन देते थे. तो वही छात्र वाहिनी के युवा शिबू सोरेन के झारखंड अलग राज्य आंदोलन को समर्थन करते थे. तब छात्र नेताओं ने पार्टी का झंडा नहीं ढ़ोया, लेकिन हमेशा झामुमो को नैतिक समर्थन दिया करता था. उस समय झामुमो ने महाजनों के खिलाफ आंदोलन और शराब मुक्ति समेत 20 सूत्री कार्यक्रम पर अपना काम शुरू किया था. मधुपुर के गांधी चौक पर गुरुजी की बड़ी सभा हुई थी. बाद में दर्जनों बार गुरुजी मधुपुर आते रहे. उनको जब पुलिस बेसब्री से ढूंढ रही थी तब मधुपुर के बड़बाद, बरसतिया, जरियाटांड़, भोक्ता छोरांट में विनय चंद्र सिंह आवास भूमिगत रहते थे. उन्होंने बताया कि गुरुजी को सत्तू का शरबत उन्हें बहुत पसंद था. वह कभी मधुपुर के रेलवे क्वार्टर तो कभी डाक बंगला या रेलवे के गेस्ट हाउस में ठहरते थे. शिवप्रसाद गुप्ता, हाजी हुसैन अंसारी, कंगलू मरांडी, लतिका मुर्मू, सोहन मुर्मू, विजय प्रकाश साह, दिलीप चौधरी, विनय तिवारी, रंजन घोष, बलराम हांसदा, नीताई सोरेन, अस्तानंद झा, मंगल सोरेन समेत दर्जनों लोग झारखंड अलग राज आंदोलन में उनके साथ रहे. सैकड़ों लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से उनका समर्थन किया. गुरुजी को अपने घर में छुपा कर रखना, उन्हें भोजन कराना आंदोलनकारी अपनी खुशकिस्मती मानते थे. महाजनों के खिलाफ जब उन्होंने हावड़ा-दिल्ली दंड का प्रावधान किया था तब क्षेत्र के कई महाजनों को या दंड सुनाया गया था. महाजनों से ना लेना है और ना देना है. इस शर्त का उल्लंघन करने पर हावड़ा दिल्ली दंड का प्रावधान किया था. जब गुरु जी मधुपुर आते थे तो झारखंड पार्टी के नेता डॉक्टर सुरेश को जरूर याद करते थे. वरिष्ठ पत्रकार दिवंगत भोला सर्राफ के काफी नजदीकी थे. क्योंकि वह झारखंड आंदोलन की खबरों का कवरेज निष्पक्ष रूप से देते थे. गुरुजी मधुपुर में जलेबी खाना नहीं भूलते थे. बताया जाता है कि वर्ष 1988- 89 में हाजी हुसैन अंसारी झामुमो से जुड़े और प्रदेश के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को तेजी से पार्टी में जोड़ने का काम किया. बाद में हाजी हुसैन अंसारी कई बार झामुमो से विधायक और मंत्री बने. मधुपुर शहरी इलाके से अधिक ग्रामीण इलाके में गुरुजी की पकड़ थी. गुरुजी वंचितों, शोषितों और गरीब गुरुबों को संगठित कर झारखंड की दासता के खिलाफ महानायक के रूप में उभरे. गुरुजी के निधन पर क्षेत्र के लोगों में शोक की लहर है. आज भी बडे बुजुर्ग उनके किस्से कहानी सुनाते है.

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Published by: Balram

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