सारठ. सिकटिया बराज से विस्थापित गांवों के किसानों को राज्य एवं केंद्र प्रायोजित योजना के तहत केज कल्चर के माध्यम से मछली पालन से जोड़ने का उद्देश्य करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद विभागीय अधिकारियों की अदूरदर्शिता का शिकार होता नजर आ रहा है. शुरुआत में किसानों में मछली पालन को लेकर काफी उत्साह था, लेकिन उचित मार्गदर्शन और निगरानी के अभाव में अब यह योजना दम तोड़ती दिख रही है. बताया जाता है कि वर्ष 2013-14 से 2020-21 तक केंद्र और राज्य प्रायोजित मद से कुल 117 केज लगाए गए थे. इन केजों के माध्यम से सिकटिया बराज से विस्थापित अमला चातर, माथाटांड़, मिश्राडीह, ठुठा सिमर, ऊपर बहियार, बन्दरिसोल, अम्बा कनाली, सोनाबाद और नावाडीह गांवों के किसानों को मछली पालन से जोड़ा गया था. हालांकि समय के साथ कई किसानों के केज बाढ़ में बह गये. वर्तमान स्थिति यह है कि कई किसान नाम मात्र के लिए ही मछली पालन कर रहे हैं. नावाडीह के आदिवासी किसानों ने बताया कि कुल 117 केजों में से मात्र 16 या 17 केज ही सही स्थिति में हैं, जिनमें कुछ मछलियां हैं. बाकी अधिकांश केजों में मछली नहीं है, वहीं कई केजों के जाल फट जाने से वे पूरी तरह बेकार हो चुके हैं.
विधानसभा में उठा मामला
सिकटिया बराज में केज कल्चर लगाने के मुद्दे को लेकर सारठ विधायक चुन्ना सिंह ने 12 मार्च को विधानसभा में तारांकित प्रश्न के माध्यम से मामला उठाया था. इस पर विभागीय मंत्री ने अपने जवाब में कहा कि केंद्र और राज्य मद से 117 केज लगाये गये हैं और उनमें मछली पालन प्रगति पर है. हालांकि जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है. विधायक चुन्ना सिंह ने कहा कि वे स्वयं किसानों से मिलकर वास्तविक स्थिति की जानकारी लेंगे और उसके बाद विभाग से सकारात्मक पहल की मांग करेंगे, ताकि सरकारी योजनाओं के उद्देश्य की सार्थकता साबित हो सके.
हाइलार्ट्स: मछली पालन का उद्देश्य विभागीय अधिकारियों की अदूरदर्शिता का शिकार