-डॉ पीएस वोहरा,आर्थिक मामलों के जानकार-
Digital India : बीते एक दशक में भारत में हुई डिजिटल क्रांति का अर्थव्यवस्था को चार ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने में बड़ा योगदान है. आज देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी स्मार्टफोन के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग करती है. इस माध्यम के जरिये सूचनाओं के आदान-प्रदान के कारण विभिन्न कामकाजी पुरुष व महिला बीते एक दशक से अधिक समय में डिजिटल क्रांति का हिस्सा बन गये हैं. आज भारतीय समाज का तकरीबन हर तबका अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु डिजिटल सिस्टम पर निर्भर हो चुका है. भारत में आज करीब 96 करोड़ लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं, जिनमें 57 प्रतिशत ग्रामीण हैं. यह हैरतअंगेज लग सकता है, पर सच्चाई यही है. इसी तरह, शहरी उपभोक्ताओं में करीब 23 करोड़ लोग पिछले वर्ष ऑनलाइन शॉपिंग में संलग्न रहे. वहीं 44 प्रतिशत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विभिन्न स्रोतों का उपयोग भी किया.
इतना ही नहीं, आज यूपीआइ भारतीय समाज के भुगतान का एक बड़ा माध्यम बन गया है. यकीनन इसके चलते बैंकिंग व्यवस्था में भी नकदी के प्रवाह में आमूलचूल परिवर्तन आया है. यूपीआइ की शुरुआत नवंबर, 2016 में एकाएक हुई नोटबंदी के बाद एक विकल्प के रूप में हुई थी, परंतु इसी सरकार ने नोटबंदी से पहले लोगों को बैंकिंग में लाने के लिए जनधन खातों की भी शुरुआत की थी. आज एक दशक के बाद भारतीय समाज जनधन खातों के माध्यम से यूपीआइ के जरिये भुगतान और इंटरनेट का उपयोग करने के कारण डिजिटल क्रांति का बड़ा हिस्सा बन चुका है. इससे अर्थव्यवस्था में भी बड़ी तेजी आयी है. इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ है कि भारत में स्मार्टफोन की बिक्री तेजी से बढ़ी है. भारत ने इसे एक अवसर के रूप में लेकर इसके उत्पादन में भी अपनी बड़ी पैठ बनायी है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते एक दशक में भारत ने मोबाइल फोन की मांग को तकरीबन शत-प्रतिशत तक घरेलू उत्पादन पर निर्भर कर दिया है. वर्ष 2014 तक करीब 75 प्रतिशत मोबाइल की मांग को आयात के माध्यम से पूरा किया जाता था, जो आज एक प्रतिशत से भी कम रह गया है. वर्ष 2024-25 में 5.45 लाख करोड़ रुपये मूल्य के मोबाइल का उत्पादन हुआ और भारत का निर्यात दो लाख करोड़ रुपये से ऊपर चला गया, जो 2014-15 में मात्र 1,500 करोड़ रुपये था. बीते एक दशक में मोबाइल उत्पादन की यूनिटें भी 300 से अधिक हो गयी हैं, जो पहले मात्र दो ही थीं. यह आत्मनिर्भरता की तरफ भारत की बड़ी छलांग है. इसमें 2020 में सरकार द्वारा देश में मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू की गयी पीएलआइ योजना का बड़ा योगदान है.
वर्तमान में 32 लाभार्थी कंपनियों को सरकार द्वारा इस क्षेत्र में करीब 17,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी गयी है. लेकिन इन सबके बीच चिंता की बात यह है कि 2026 के पहले चार महीनों में भारत के घरेलू बाजार में मोबाइल की मांग में एकाएक कमी आयी है और यह आंकड़ा तकरीबन 10 प्रतिशत के आसपास है. भारत में कुल मोबाइल की मांग का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा 10,000 से लेकर 20,000 रुपये तक के मूल्य वाली मोबाइल का है और इसी मूल्य श्रेणी की मांग में पिछले चार महीनों में अचानक से कमी आयी है. इस कमी का कारण है मोबाइल में लगने वाली मेमोरी चिप की किल्लत हो जाना, क्योंकि वैश्विक स्तर पर मेमोरी चिप बनाने वाली कंपनियों ने साधारण मोबाइल फोन के लिए चिप का उत्पादन बंद कर दिया है.
अब उनका पूरा ध्यान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए हाई बैंडविथ वाली मेमोरी चिप बनाने पर है. इसके चलते साधारण मोबाइल में उपयोग होने वाली मेमोरी चिप की लागत 50 से 60 प्रतिशत बढ़ गयी है. इसी के चलते मोबाइल कंपनियों को 10 से 20 हजार रुपये तक के मोबाइल का विक्रय मूल्य 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ाना पड़ा है. इन सबके बीच डॉलर के मुकाबले लगातार रुपये का अवमूल्यन भी संकट पैदा कर रहा है, क्योंकि मोबाइल निर्माताओं के लिए लागत का भुगतान करना महंगा होता जा रहा है. इसका स्पष्ट कारण भारत द्वारा मोबाइल चिप का आयात करना है.
इसका एक और कारण है, वह है जीएसटी की दर. वर्ष 2025 में जब जीएसटी की दरों में सुधार किया गया था, तब मोबाइल को उन कर सुधारों से दूर रखा गया था. पहले की तरह आज भी मोबाइल पर जीएसटी की दर 18 प्रतिशत ही है. अब जबकि घरेलू बाजार में 10 से 20 हजार वाले मोबाइल के दाम चार से पांच हजार रुपये तक बढ़ गये हैं, ऐसे में यदि सरकार मोबाइल पर लगने वाले जीएसटी दर में कुछ कमी करती है, तो इससे आम उपभोक्ता को राहत मिलेगी. अन्यथा, भारतीय समाज का एक बड़ा तबका डिजिटल क्रांति से बाहर होने को मजबूर हो जायेगा, जो पिछले एक दशक में इससे जुड़ा है और जिसके प्रयासों से एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था चार ट्रिलियन डॉलर तक पहुंची है. यह उन भारतीय निर्माताओं के लिए भी बड़ी राहत होगी, जिन्होंने बीते एक दशक में मोबाइल उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाया और विश्व के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश का तमगा भी दिलाया.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
