खोरठा को साहित्यिक पहचान दिलाने में श्रीनिवास पानुरी की अहम भूमिका

मधुपुर के भेड़वा नवाडीह स्थित राहुल अध्ययन केंद्र में आयोजन

मधुपुर. शहर के भेड़वा नवाडीह स्थित राहुल अध्ययन केंद्र में खोरठा भाषा साहित्य व संस्कृति विकास परिषद के तत्वावधान में खोरठा के अग्रदूत श्रीनिवास पानुरी की जयंती खोरठा दिवस के रूप में मनायी गयी. उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर लोगों ने श्रद्धासुमन अर्पित किया. मौके पर धनंजय प्रसाद ने कहा कि श्रीनिवास पानुरी खोरठा भाषा और साहित्य के एक महान कवि और लेखक थे. जिनका जन्म 25 दिसंबर 1920 को धनबाद में हुआ था. उन्हें खोरठा के भीष्म पितामह के रूप में जाना जाता है. जिन्होंने खोरठा को साहित्यिक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभायी. बालकिरिण, आंखिक गीत, चाभी-काठी जैसी रचना किया. पानुरी खोरठा भाषा व साहित्य के सफल साधक थे. आर्थिक तंगी के बावजूद भी वो साहित्य साधना में अनवरत लगे रहे. मुफलिसी कभी भी उनकी साहित्य साधना के आड़े नहीं आती थी. उन्होंने संघर्ष करते हुए 40 वर्षों की साहित्यिक जीवन में विभिन्न विधाओं की करीब चालीस पुस्तकों की रचना किये. खोरठा भाषा व साहित्य को समृद्ध बनाया. उनके योगदान से भाषा व साहित्य आज अपने मुकाम पर है.

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