रांची/देवघर. किसी आधिकारिक पुलिस बयान को उसकी वास्तविकता और स्रोत के साथ खबर के रूप में प्रकाशित करने वाले पत्रकार को उस बयान के लिए आपराधिक मानहानि का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. झारखंड हाइकोर्ट का देवघर से जुड़े एक पुराने मामले में आया यह फैसला पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक नजीर के रूप में देखा जा रहा है. अदालत ने साफ किया कि समाचार रिपोर्ट करने वाले पत्रकार और बयान देने वाले व्यक्ति की भूमिका एक नहीं है. जब रिपोर्टर अपनी ओर से कोई नया, मनगढ़ंत या व्यक्तिगत आरोप नहीं जोड़ता और आधिकारिक बयान को ही रिपोर्ट करता है, तो केवल उसके प्रकाशन के आधार पर पत्रकार की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती. मामला वर्ष 2005 का है. देवघर के एएस कॉलेज के तत्कालीन प्रधान लिपिक बिमलेंदु नारायण बाल ने ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित एक खबर को लेकर शिकायत दर्ज करायी थी. खबर में कॉलेज में फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर हुए अवैध नामांकन से संबंधित तत्कालीन एसडीपीओ के बयान और कॉलेज की नियम प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था. शिकायतकर्ता का आरोप था कि खबर के प्रकाशन से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची.
रिपोर्टर ने अपनी तरफ से नहीं गढ़ी थी कोई बात
मामले की सुनवाई में हाइकोर्ट ने खबर में प्रकाशित सामग्री और उसके स्रोत पर विशेष गौर किया. अदालत के सामने आया कि खबर में तत्कालीन एसडीपीओ विपुल शुक्ला का आधिकारिक बयान प्रकाशित किया गया था. एसडीपीओ ने बीए और बीकॉम में फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नामांकन तथा जांच के दौरान प्रधान लिपिक समेत कुछ लोगों की जवाबदेही से संबंधित जानकारी दी थी. खंडपीठ ने पाया कि रिपोर्टर संजीत कुमार मंडल ने अपनी ओर से कोई आरोप नहीं लगाया था. उन्होंने पुलिस अधिकारी के आधिकारिक बयान को समाचार के रूप में प्रकाशित किया था. इसलिए उस बयान के आधार पर प्रकाशित खबर के लिए रिपोर्टर को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
मूल बयान देने वाले अधिकारी के खिलाफ शिकायत नहीं
फैसले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण रहा कि जिस पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर खबर प्रकाशित हुई थी, शिकायतकर्ता ने उस अधिकारी के खिलाफ मानहानि की कोई शिकायत दर्ज नहीं करायी थी. अदालत ने इस पहलू को भी रिपोर्टर की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के सवाल में महत्वपूर्ण माना. यानी अदालत ने यह अंतर स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा लगाया गया आरोप और पत्रकार द्वारा उस आरोप या आधिकारिक बयान की रिपोर्टिंग एक ही बात नहीं है. जिम्मेदार पत्रकारिता में स्रोत का आधिकारिक बयान प्रकाशित करना अपने आप में पत्रकार की ओर से आरोप लगाना नहीं माना जा सकता.
पहले एक साल की सजा, फिर बरी
इस मामले में जून 2010 में देवघर की न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने तत्कालीन संपादक रवि प्रकाश, रिपोर्टर संजीत कुमार मंडल और तत्कालीन प्राचार्य डॉ. नागेश्वर शर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत दोषी ठहराते हुए एक वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनायी थी. आरोपियों की अपील पर सितंबर 2011 में देवघर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया और तीनों की दोषसिद्धि व सजा रद्द कर दी. इसके खिलाफ शिकायतकर्ता हाइकोर्ट पहुंचे थे.
पत्रकारिता के लिए क्यों अहम है फैसला
न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने सेशंस कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी. सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अपील लंबित रहने के दौरान तत्कालीन संपादक रवि प्रकाश का निधन हो चुका है. हाइकोर्ट के फैसले से जिम्मेदार और तथ्याधारित रिपोर्टिंग के लिए अहम न्यायिक आधार सामने आया है. खासकर पुलिस, प्रशासन या अन्य आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त बयानों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है. अदालत ने रिपोर्टर की भूमिका को बयान देने वाले अधिकारी से अलग मानते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पत्रकार द्वारा किसी आधिकारिक बयान को निष्पक्ष रूप से रिपोर्ट करना और स्वयं किसी पर आरोप लगाना समान नहीं है. प्रभात खबर की ओर से एडवोकेट दीपक भारती की दलीलों पर हाई कोर्ट की डबल बेंच ने फैसला दिया.
